भूपेन्द्र भारतीय (अधिवक्ता व लेखक)
विगत कुछ वर्षों से देखने में आया है कि बढ़ते शहरीकरण के कारण अब शहरों से लगे गाँवों की कृषि भूमियों के भाव आसमान को छूने लगे। भूमि के बढ़ते भाव में अंधाधुंध शहरीकरण, भूमाफियों व काले धन का बड़ा हाथ है। वास्तविकता में भूमि की बढ़ती कीमत भूमि के असली मालिक तक नहीं पहुंचती है। बिचौलिए व भूमाफियां इस बढ़ते भाव का लाभ लठा रहे हैं। वहीं बहुत से धनाढ्य लोग काले धन को सफेद बनाने के लिए कृषि भूमि लेकर नकली किसान बनकर आयकर की सीधे चोरी धडल्ले से करते हैं।
इसी मोह व लालच में अब बिचौलिए व भूमाफिया लोग ग्रामीण भारत की कृषि भूमि की ओर गिद्ध की तरह देखने लगे हैं। वे गाँवों के भोलेभाले किसानों को उनकी आजीविका से जुड़ी कृषि भूमि को बेचने के लिए अधिक लाभ का लालच व मोह बताकर उन्हें फंसा रहे हैं। हम सब जानते हैं कि गांव के व्यक्ति के लिए कृषि भूमि(जमीन) उसकी सबसे बड़ी साख होती है। वह उसके लिए सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, अपितु विरासत व मान-सम्मान का भी प्रश्न होता है। पीढ़ियों से पूर्वजों के द्वारा आने वाली पीढ़ी की आजीविका के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में संरक्षित व बचाई गई भूमि यदि किसी तरह व थोड़े से लालच में बेच दिया जाता है तो वह ग्रामीण व्यक्ति के लिए बड़े खतरे व अपमान का विषय गांव में रहता है। ऐसे मे यदि कोई ग्रामीण व्यक्ति किसी लालच व मजबूरी में फंसकर अपनी जमीन बेचता है तो वह गांव व उस किसान के लिए खतरे की घंटी है। वहीं बढ़ते शहरीकरण, जमीनों के बढ़ते भाव व काले धन को सफेद करने तथा कम समय में अधिक कमाई के चक्कर में बिचौलिए व भूमाफिया किसानों को लाभ का मोह व लालच दिखाकर कृषि भूमि को बेचने के लिए फंसा रहे हैं।
जिससे गाँवो में बाहरी लोग जमीन के मालिक बनकर गाँवों की समरसता व एकता को खतरा बढ़ने लगा है। वहीं इससे ग्रामीण भारत की जनसांख्यिकीय बदलने का खतरा भी उत्पन्न हो रहा है। ऐसे में सरकार, भू राजस्व अधिकारियों व भारत के ग्रामीण समाज को इन बिचौलियों व भूमाफियाओं से सावधान रहने का समय आ गया है। कृषि भूमि के बेचने व गाँवों से बाहर के व्यक्ति को गांव की जमीन बेचने-खरीदने पर इससे संबंधित विधिक पहलुओं पर भी विधायिका व सरकार को विचार करना चाहिए। जिससे ग्रामीण भारत का मूल स्वरूप, समरसता व संस्कृति संरक्षित रहे।

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