लखनऊ। राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) आज लखनऊ में बड़े सम्मेलन के जरिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी ताकत दिखाने की तैयारी में है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी की अगुवाई में होने वाला यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि रालोद अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने पारंपरिक जाट-गुर्जर आधार से आगे बढ़कर पूर्वांचल के ब्राह्मण मतदाताओं के बीच भी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है।
सम्मेलन में पूर्वांचल के प्रमुख ब्राह्मण नेता बीके शुक्ला की भूमिका अहम बताई जा रही है। उनके साथ करीब 1,500 ब्राह्मणों के जुटने का दावा किया जा रहा है। अगर यह जुटान अपेक्षा के अनुरूप होती है तो रालोद के लिए यह केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक समीकरणों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का संदेश भी होगा।
पश्चिम से पूर्वांचल तक विस्तार की कोशिश
रालोद की राजनीति लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय के प्रभाव से जुड़ी रही है। गुर्जर और अन्य किसान समुदायों में भी पार्टी ने अपना आधार बनाने की कोशिश की है। अब लखनऊ में सम्मेलन के जरिए पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि उसका राजनीतिक विस्तार केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है।
ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। पूर्वांचल में ब्राह्मण मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी समीकरण प्रभावित करते हैं। ऐसे में रालोद का यह प्रयोग समाजवादी पार्टी समेत अन्य दलों के लिए भी राजनीतिक संकेत है।
अखिलेश के सामने नया सवाल
उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। ऐसे में जयंत चौधरी का लखनऊ में बड़ा शक्ति प्रदर्शन यह सवाल खड़ा करता है कि क्या रालोद आने वाले समय में सपा के साथ सहयोगी की भूमिका से आगे बढ़कर स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार की कोशिश करेगा?
जाट, गुर्जर और ब्राह्मण—इन तीन सामाजिक समूहों को जोड़ने की रणनीति सफल हुई तो रालोद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बाहर भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाश सकता है।
आज का सम्मेलन इसलिए सिर्फ भीड़ का आंकड़ा नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि जयंत चौधरी की ‘सामाजिक विस्तार’ की राजनीति जमीन पर कितनी मजबूती से उतरती है और लखनऊ से निकला यह संदेश 2027 के विधानसभा चुनाव तक कितना असर पैदा करता है।

Post a Comment