प्रणव बजाज
राम मंदिर केवल पत्थरों से बना कोई भवन नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था, विश्वास और भावनाओं का प्रतीक है। देश-दुनिया के श्रद्धालुओं ने मंदिर निर्माण और उससे जुड़े कार्यों के लिए अपनी क्षमता के अनुसार धन दिया। किसी ने बड़ी राशि दी, तो किसी ने अपनी छोटी-सी बचत से योगदान किया। इसलिए राम मंदिर के चढ़ावे और उससे जुड़े धन पर उठने वाला हर सवाल सामान्य आर्थिक विवाद नहीं है—यह सीधे श्रद्धालुओं के विश्वास से जुड़ा मामला है।
अब पूर्व महासचिव चंपत राय की डायरी में दर्ज कथित विवरण ने इस पूरे प्रकरण को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। डायरी में 25 दिनों तक लगातार दुष्प्रचार चलने और व्यक्तिगत जीवन को निशाना बनाए जाने का उल्लेख बताया जा रहा है। चंदा चोरी के खुलासे के पहले दिन चार घंटे की पूछताछ का जिक्र भी सामने आया है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसने किस पर आरोप लगाया। असली सवाल यह है कि चढ़ावे का पैसा कहां से आया, किसके पास रहा, किस खाते में गया, किस उद्देश्य से खर्च हुआ और उसका पूरा लेखा-जोखा किस स्तर पर जांचा गया?
मंदिर से जुड़े आर्थिक मामलों में पारदर्शिता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। श्रद्धालु जब दान करता है तो वह यह उम्मीद करता है कि उसकी राशि निर्धारित उद्देश्य के लिए ही इस्तेमाल होगी। इसलिए यदि कहीं वित्तीय अनियमितता का आरोप सामने आता है, तो जांच का रास्ता बंद करने के बजाय उसे और मजबूत किया जाना चाहिए।
दूसरा गंभीर प्रश्न है—क्या किसी आरोप का जवाब व्यक्तिगत आरोपों से दिया जाना चाहिए? यदि किसी व्यक्ति के निजी जीवन को निशाना बनाया गया, तो वह भी गलत है। किसी आर्थिक आरोप की सच्चाई तय करने का आधार किसी व्यक्ति का निजी जीवन नहीं, बल्कि दस्तावेज, बैंक खाते, रसीदें, भुगतान अभिलेख और जांच के निष्कर्ष होने चाहिए।
इसी तरह किसी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी मान लेना भी न्यायसंगत नहीं है। जांच पूरी होने से पहले फैसला सुनाना भी उतना ही खतरनाक है, जितना किसी गंभीर वित्तीय शिकायत को राजनीतिक या भावनात्मक विवाद बताकर दबा देना।
राम मंदिर के चढ़ावे के मामले में इसलिए दोहरी जिम्मेदारी बनती है। एक तरफ आरोप लगाने वालों को अपने आरोपों के प्रमाण सामने रखने चाहिए, दूसरी तरफ मंदिर प्रबंधन और संबंधित संस्थाओं को भी संदेह दूर करने के लिए आवश्यक दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो पारदर्शिता से डरने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए।
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल है—राम के नाम पर आया धन क्या उसी पवित्रता से संभाला गया, जिस पवित्र भावना से श्रद्धालुओं ने उसे दिया था?
इस सवाल का जवाब बयानबाजी से नहीं मिलेगा। जवाब मिलेगा जांच से। जवाब मिलेगा दस्तावेजों से। जवाब मिलेगा सार्वजनिक लेखा परीक्षण से।
मंदिर की गरिमा किसी व्यक्ति से बड़ी है। संस्था की प्रतिष्ठा किसी पदाधिकारी से बड़ी है। और करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास किसी भी राजनीतिक या व्यक्तिगत विवाद से कहीं बड़ा है।
इसलिए आवश्यकता है कि पूरे मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो। चढ़ावे से जुड़े प्रत्येक आरोप की जांच हो और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं। यदि चोरी या आर्थिक अनियमितता प्रमाणित होती है तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो। यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो आरोप लगाने वालों की जवाबदेही भी तय हो।
क्योंकि सवाल केवल धन का नहीं है।
यह उस विश्वास का सवाल है जिसे करोड़ों लोगों ने राम के नाम पर सौंपा है।
और उस विश्वास का हिसाब मांगना किसी की आस्था पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि आस्था की रक्षा करना है।
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