Top News

एक देश, एक चुनाव’ पर चिदंबरम का विरोध, जेपीसी के सामने उठाए संवैधानिक सवाल

नई दिल्ली। ‘एक देश, एक चुनाव’ की व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने संयुक्त संसदीय समिति के सामने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे असंवैधानिक और तर्कहीन बताया। उन्होंने समिति के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराते हुए प्रस्ताव की संवैधानिक व्यवहार्यता और लोकतांत्रिक प्रभावों पर कई सवाल उठाए।



चिदंबरम का मुख्य तर्क है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के लिए मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बड़े बदलाव करने होंगे। उनका सवाल है कि यदि किसी राज्य की विधानसभा समय से पहले भंग हो जाती है या केंद्र में सरकार अपना बहुमत खो देती है, तो एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था किस तरह लागू होगी।


उन्होंने चुनावों के बीच संवैधानिक अवधि और सरकारों की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां और विधानसभा की अवधि अलग होती है। ऐसे में सभी चुनावों को एक निश्चित समय-चक्र में बांधना संघीय ढांचे पर असर डाल सकता है।


पूर्व वित्त मंत्री ने यह भी सवाल उठाया कि बार-बार होने वाले चुनावों को लोकतंत्र की समस्या मानना कितना उचित है। चुनावों के कारण प्रशासनिक और आर्थिक संसाधनों पर दबाव जरूर पड़ता है, लेकिन चुनाव जनता को सरकार से सवाल पूछने और अपनी पसंद की सरकार चुनने का अवसर भी देते हैं।


अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ से चुनावी खर्च और प्रशासनिक बोझ घटेगा या इसके लिए संविधान और संघीय व्यवस्था में ऐसे बदलाव करने पड़ेंगे, जिनका व्यापक राजनीतिक प्रभाव होगा। जेपीसी के सामने चिदंबरम की आपत्तियों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है।

Post a Comment

Previous Post Next Post