प्रणव बजाज : सम्पादकीय
विदेशी अंशदान नियमन कानून यानी एफसीआरए पर बहस को केवल सरकार बनाम विपक्ष या सत्ता बनाम गैर-सरकारी संगठनों के चश्मे से देखना गंभीर भूल होगी। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या भारत की नीतियों, संस्थाओं और सामाजिक व्यवस्था पर विदेशी धन के माध्यम से किसी बाहरी प्रभाव को बढ़ने से रोकना राष्ट्रीय हित है? निस्संदेह है। लेकिन इसके साथ दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या राष्ट्रीय हित के नाम पर हर विदेशी सहायता को संदेह की निगाह से देखना उचित होगा?
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विदेशी धन का प्रवेश कोई नई घटना नहीं है। एफसीआरए की मूल व्यवस्था 1970 के दशक में अस्तित्व में आई थी। यानी विदेशी अंशदान की निगरानी का विचार किसी एक सरकार की देन नहीं, बल्कि लंबे समय से राष्ट्रीय नीति का हिस्सा रहा है। समय के साथ कानून बदला, नियम कड़े हुए और सरकारों ने विदेशी फंडिंग से जुड़े संगठनों पर निगरानी बढ़ाई।
यहां सरकार का तर्क समझना कठिन नहीं है। यदि कोई संगठन विदेश से धन प्राप्त करता है और उसी धन का इस्तेमाल भारत की राजनीतिक प्रक्रिया, सामाजिक तनाव, रणनीतिक हितों या नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने के लिए होता है, तो राज्य को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता केवल सरकारों से नहीं, गैर-सरकारी संस्थाओं और अन्य प्रभावशाली संगठनों से भी अपेक्षित होनी चाहिए।
लेकिन कानून की शक्ति के साथ उसकी निष्पक्षता की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
एफसीआरए की कार्रवाई यदि ठोस वित्तीय अनियमितता, धन के दुरुपयोग या घोषित उद्देश्य से अलग गतिविधियों के प्रमाण पर आधारित है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। मगर यदि किसी संस्था की आवाज सरकार की आलोचना करती है और केवल इस आधार पर उस पर संदेह किया जाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और असहमति—इन दोनों को एक ही तराजू में तौलना खतरनाक है।
देशहित का अर्थ यह नहीं कि सरकार से कोई सवाल न पूछा जाए। और सरकार की आलोचना का अर्थ यह भी नहीं कि आलोचक राष्ट्रविरोधी है। लोकतंत्र की मजबूती इसी संतुलन में है कि विदेशी प्रभाव पर कठोर निगरानी हो, लेकिन वैध असहमति और स्वतंत्र सामाजिक गतिविधियों के लिए लोकतांत्रिक स्थान भी सुरक्षित रहे।
आज जरूरत एफसीआरए को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने की है। किस संस्था पर कार्रवाई हुई, किस नियम का उल्लंघन हुआ, कितनी राशि का संदिग्ध उपयोग हुआ और जांच में कौन से दस्तावेज सामने आए—इन सवालों के स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक होने चाहिए।
कानून सबके लिए समान हो—यही सबसे बड़ी कसौटी है।
विदेशी धन यदि भारत की संप्रभुता, नीति या सामाजिक स्थिरता को प्रभावित करने का माध्यम बन रहा है तो उस पर रोक जरूरी है। लेकिन यदि कोई संस्था कानून का पालन करते हुए वैध सामाजिक, शैक्षणिक, मानवीय या विकास संबंधी काम कर रही है, तो केवल विदेशी स्रोत से धन मिलने के कारण उसे कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा।
एफसीआरए की बहस आखिरकार विदेशी धन की नहीं, भारत की लोकतांत्रिक आत्मनिर्भरता और संस्थागत पारदर्शिता की बहस है।
राष्ट्रीय हित सर्वोच्च है—इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। लेकिन राष्ट्रीय हित की परिभाषा भी कानून, संविधान, पारदर्शिता और समानता की कसौटी पर ही तय होनी चाहिए।
क्योंकि मजबूत राष्ट्र वह नहीं जहां सवाल पूछने की जगह खत्म हो जाए; मजबूत राष्ट्र वह है जहां विदेशी प्रभाव पर पहरा भी हो और लोकतांत्रिक सवाल पूछने का अधिकार भी सुरक्षित रहे।

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