किसान आंदोलन की भेंट चढ़ेंगी दो कलेक्टरों की कुर्सियां!

7-8 जिलों में तबादले की आहट, मैदानी प्रबंधन की रिपोर्ट बनी मुसीबत



भोपाल। मध्यप्रदेश में प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट अब तेज हो गई है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि जल्द ही 7 से 8 जिलों के कलेक्टरों को इधर से उधर किया जा सकता है। कुछ अधिकारियों को जिले की जिम्मेदारी से हटाकर मंत्रालय भेजे जाने की तैयारी है, तो कुछ अफसरों को दोबारा जिले की कमान सौंपे जाने की संभावना जताई जा रही है।


इस संभावित फेरबदल में दो कलेक्टर सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। दोनों जिलों में किसान आंदोलन के दौरान प्रशासन के मैदानी प्रबंधन को लेकर सरकार तक जो रिपोर्ट पहुंची, वह कथित तौर पर संतोषजनक नहीं रही। किसानों के साथ संवाद, आंदोलन की स्थिति पर नियंत्रण और समय रहते प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर सवाल उठे हैं। अब यही फीडबैक दोनों कलेक्टरों की कुर्सी पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।


हालांकि अभी तबादला सूची जारी नहीं हुई है और सरकार की ओर से किसी अधिकारी को हटाने की पुष्टि भी नहीं की गई है। लेकिन प्रशासनिक हलकों में संभावित सूची को लेकर चर्चाएं गर्म हैं।


माना जा रहा है कि सरकार इस फेरबदल के जरिए मैदानी अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देना चाहती है कि कलेक्टरी केवल बैठकों, निरीक्षणों और सरकारी प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है। संकट के समय मैदान में दिखाई देने वाला परिणाम ही असली परीक्षा है।


अब सबसे बड़ा सवाल यही है—कौन मंत्रालय पहुंचेगा, किसे नया जिला मिलेगा और किन दो कलेक्टरों की कुर्सी किसान आंदोलन के दौरान प्रशासनिक प्रदर्शन की कीमत बनेगी?


तबादला सूची आने के बाद तस्वीर साफ होगी। फिलहाल कलेक्टरों की “बिटादरी” में कुर्सियों का हिसाब शुरू हो चुका है।


किसान खेत में नाराज हो तो फसल का गणित बिगड़ता है, लेकिन किसान सड़क पर नाराज हो जाए तो कभी-कभी कलेक्टर की कुर्सी का गणित भी बिगड़ जाता है।

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