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सड़क टूटे तो जिम्मेदार कौन?

एपिसोड-3 : 

88,634 करोड़ की योजना से पहले सीएजी ने खोली सड़क व्यवस्था की पोल—काली सूची वाले ठेकेदारों को काम, अधूरे काम पर प्रमाणपत्र और घटिया निर्माण पर भी भुगतान

प्रणव बजाज

मध्यप्रदेश में 88,634 करोड़ रुपये की सड़क योजना सामने है। लेकिन नई सड़कों की चमक से पहले पुराने कामों का हिसाब जरूरी है।



भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की सड़क संबंधी रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश लोक निर्माण विभाग की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 2018-19 से 2022-23 तक की 276 सड़क परियोजनाओं की जांच और 51 सड़कों के मौके पर निरीक्षण के बाद सीएजी ने कई अनियमितताएं दर्ज कीं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि रिपोर्ट के मुताबिक काली सूची में डाले गए ठेकेदारों को भी काम या काम के आदेश दिए गए। वहीं कुछ ऐसे ठेकेदार भी पाए गए जिन्होंने सुरक्षा राशि जमा नहीं की या अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए, फिर भी उनके खिलाफ समय पर निलंबन या काली सूची की कार्रवाई नहीं हुई।


अधूरा काम, फिर भी पूरा होने का प्रमाणपत्र!


सीएजी ने रायसेन की ताड़ा-खमरिया सड़क में काम पूरा होने की तारीख से जुड़ी गंभीर अनियमितता दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार समय-विस्तार की प्रक्रिया बाद में भी चलती रही, जिससे गलत या समय से पहले जारी पूर्णता प्रमाणपत्र की आशंका सामने आई और सरकार को करीब 1.51 करोड़ रुपये की संभावित दंड राशि से नुकसान हुआ।


ग्वालियर की गोल पहाड़िया-मोतिजील सड़क में भी सीएजी ने पाया कि काम पूरा हुए बिना दोष-दायित्व अवधि शुरू कर दी गई। करीब 1.36 करोड़ रुपये के 11 काम मौके पर निष्पादित नहीं पाए गए।


घटिया काम मिला, भुगतान भी हुआ


सीएजी ने 11 सड़क कार्यों में पीक्यूसी और डीएलसी की संपीड़न क्षमता निर्धारित मानकों से कम पाई। इसके बावजूद घटिया काम स्वीकार किया गया और भुगतान में कटौती नहीं की गई। रिपोर्ट के अनुसार इससे करीब 6.43 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान हुआ।


यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—


ठेकेदार घटिया सड़क बनाए तो दोषी वह है, लेकिन उस सड़क को पास करने वाला कौन है?


88,634 करोड़ पर सरकार को जवाब देना होगा


सीएजी ने खुद सिफारिश की है कि घटिया काम, अधिक भुगतान और अनुमान संबंधी गड़बड़ियों से हुए सरकारी नुकसान की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए। उसने अधिकारियों और ठेकेदारों दोनों पर दंड की व्यवस्था मजबूत करने की बात कही है।


अब सवाल मोहन यादव सरकार से है—


नई सड़क का ठेका देने से पहले क्या पुराने ठेकेदारों और अधिकारियों का पूरा रिकॉर्ड जांचा जाएगा?


क्या सड़क खराब होने पर सिर्फ ठेकेदार पर कार्रवाई होगी या गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले अधिकारी भी जवाब देंगे?


और क्या 88,634 करोड़ खर्च करने से पहले सरकार सीएजी की पुरानी आपत्तियों का हिसाब जनता के सामने रखेगी?


क्योंकि सवाल सड़क बनाने का नहीं है।


सवाल यह है कि सड़क टूटने के बाद जिम्मेदारी भी टूट जाती है या किसी की तय होती है?


बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल जारी रहेगी...

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