प्रणव बजाज
दतिया उपचुनाव में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने दो सदस्यीय समीक्षा समिति बना दी है। प्रदेश महामंत्री गौरव रणदीवे और वरिष्ठ नेता अंबाराम कराड़ा को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे चुनाव परिणाम की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को सौंपें।
अब प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सवाल यह नहीं है कि हार क्यों हुई, बल्कि यह है कि क्या समीक्षा का निष्कर्ष पहले से तय है, या इस बार सच बोलने की भी अनुमति होगी?
व्यंग्य यही कहता है कि जब सत्ता के गलियारों में हर कुर्सी एक-दूसरे से जुड़ी हो, तब जांच अक्सर आईना नहीं, पर्दा बन जाती है। जनता पूछ रही है कि यदि चुनाव के दौरान प्रशासनिक निष्पक्षता, स्थानीय नाराजगी, संगठन की खींचतान या सत्ता के प्रभाव जैसे मुद्दों पर सवाल उठे थे, तो क्या गौरव रणदीवे और अंबाराम कराड़ा अपनी रिपोर्ट में उन पर भी खुलकर लिख पाएंगे, या निष्कर्ष वही होगा—"समन्वय की कमी" और "स्थानीय परिस्थितियां"।
सवाल यह भी है कि यदि रिपोर्ट में किसी प्रभावशाली चेहरे की जिम्मेदारी सामने आती है, तो क्या उस पर कार्रवाई होगी, या रिपोर्ट सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाएगी?
दतिया की जनता को अब हार की समीक्षा से ज्यादा इस बात का इंतजार है कि क्या इस समिति की रिपोर्ट सच का दस्तावेज बनेगी, या राजनीति की एक और औपचारिक कवायद साबित होगी।
व्यंग्य का निष्कर्ष:
"जहां फैसला पहले लिखा जा चुका हो, वहां जांच समितियां अक्सर सिर्फ औपचारिकता निभाने आती हैं। जनता परिणाम नहीं, जवाबदेही चाहती है।"

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