रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद की वासुदेवपुर कोलियरी से जुड़े 33 साल पुराने रिश्वत मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए आरोपी की जेल की सजा को घटाकर उसके द्वारा पहले ही बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया। आरोपी पूर्व बीसीसीएल फंड क्लर्क समीर कुमार चौधरी को 1993 में ₹300 की रिश्वत लेते पकड़ा गया था। न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने 20 अगस्त 2026 को फैसला सुनाया।
मामला मार्च 1993 का है। वासुदेवपुर कोलियरी में काम करने वाले पूर्व कर्मचारी रामधारी हरिजन ने आरोप लगाया था कि भविष्य निधि की बकाया राशि से जुड़े कागजात आगे बढ़ाने के लिए चौधरी ने ₹300 की मांग की। शिकायत के बाद सीबीआई ने जाल बिछाया और 22 मार्च 1993 को आरोपी को रिश्वत की रकम स्वीकार करते पकड़ा गया। जांच के दौरान रिश्वत की रकम बरामद होने के साथ हाथ धुलाई की रासायनिक जांच भी कराई गई थी।
धनबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने 26 फरवरी 2005 को चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल के कठोर कारावास और ₹1,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। चौधरी ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया।
हालांकि सजा के सवाल पर अदालत ने मामले की असाधारण लंबी अवधि को महत्वपूर्ण माना। आरोपी लगभग तीन दशक तक मुकदमे की प्रक्रिया से गुजरता रहा था। अदालत ने यह भी देखा कि उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और वह एक महीना एक दिन हिरासत में रह चुका था। इसके अलावा उसने जुर्माने और जमानत से संबंधित राशि के रूप में कुल ₹7,000 जमा किए थे।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने दो साल की सजा को पहले से भुगती गई एक महीना एक दिन की अवधि तक सीमित कर दिया। यानी अदालत ने रिश्वत के अपराध को खारिज नहीं किया, बल्कि 33 वर्ष से लंबित मुकदमे और अन्य परिस्थितियों को सजा कम करने का आधार माना।
मामला यह सवाल भी छोड़ गया कि न्याय में इतनी देरी का बोझ आखिर किस पर पड़े—अपराधी पर, पीड़ित पर या पूरी न्याय व्यवस्था पर?

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