नई दिल्ली। संसद परिसर में सांसदों द्वारा रील्स और वीडियो बनाने का चलन लगातार चर्चा में है। जहां कांग्रेस नेता सोशल मीडिया पर रील्स की बढ़ती लत को पहले ही ‘21वीं सदी का नशा’ बता चुके हैं, वहीं संसद के मानसून सत्र के दौरान कई सांसदों के परिसर में वीडियो बनाने के मामले सामने आए हैं।
संसद परिसर बना वीडियो का मंच?
सांसदों के लिए संसद परिसर राजनीतिक गतिविधियों, बैठकों और जनप्रतिनिधियों के संवाद का प्रमुख स्थान है। लेकिन सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच कुछ सांसद यहां अपने मोबाइल फोन से छोटे वीडियो बनाकर उन्हें सामाजिक माध्यमों पर साझा करते नजर आते हैं।
इन वीडियो में सांसद कभी राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं तो कभी हल्के-फुल्के अंदाज में सामग्री तैयार करते दिखाई देते हैं। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या संसद परिसर जैसे संवेदनशील और गरिमापूर्ण स्थान को सामाजिक माध्यमों की सामग्री बनाने के लिए इस्तेमाल करना उचित है?
राहुल गांधी ने रील्स पर जताई थी चिंता
राहुल गांधी रील्स की बढ़ती लोकप्रियता को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। उनका कहना रहा है कि लगातार छोटी-छोटी वीडियो सामग्री देखने की आदत युवाओं के ध्यान और सोचने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने इसे ‘21वीं सदी का नशा’ कहा था।
सांसदों के लिए सवाल अलग क्यों?
सांसद देश की जनता के प्रतिनिधि होते हैं। ऐसे में उनके व्यवहार पर आम लोगों की नजर रहती है। समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक माध्यमों के जरिए सांसद सीधे जनता तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं और युवा मतदाताओं से संवाद का यह प्रभावी माध्यम है।
वहीं आलोचकों का कहना है कि संसद परिसर की गरिमा और कार्य की गंभीरता को बनाए रखना भी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। राजनीतिक संदेश देने और मनोरंजन के लिए रील बनाने के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
सोशल मीडिया और राजनीति का नया दौर
सामाजिक माध्यम अब राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। सांसद अपने विचार, संसदीय गतिविधियां और क्षेत्र से जुड़े मुद्दे जनता तक पहुंचाने के लिए वीडियो का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में चुनौती यह है कि तकनीक का उपयोग जनसंवाद के लिए हो, लेकिन संसद की गरिमा भी कायम रहे।

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