बिजली सुधार योजना बनी सवालों के घेरे में, जनता पूछ रही—करोड़ों गए कहां?
प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश में बिजली व्यवस्था सुधारने के नाम पर चल रही पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना अब खुद सवालों के घेरे में आ गई है। सरकार और बिजली कंपनियां जिस योजना को बिजली वितरण व्यवस्था की तस्वीर बदलने वाला बड़ा सुधार बता रही हैं, उसी में करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद जमीन पर टेढ़े पोल, अधूरी अर्थिंग, खुले में पड़ी केबल, गायब सुरक्षा उपकरण और अधूरे फीडर जैसी तस्वीर सामने आने का दावा किया गया है।
मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के कार्यक्षेत्र के 16 जिलों में आरडीएसएस के तहत वितरण तंत्र मजबूत करने के काम स्वीकृत किए गए हैं। कंपनी ने पहले ही बताया था कि इन जिलों में वितरण प्रणाली को मजबूत करने के लिए हजारों करोड़ रुपये के कार्य प्रस्तावित हैं। �
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आपकी उपलब्ध निरीक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, 3310 करोड़ रुपये की योजना में लगभग 1710 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद पांच जिलों में गंभीर तकनीकी कमियां मिलीं।
यानी सवाल सिर्फ काम की गुणवत्ता का नहीं है—सवाल यह है कि जिस काम के लिए जनता के पैसे से हजारों करोड़ रुपये लगाए जा रहे हैं, उसकी निगरानी कौन कर रहा है?
हरदा में पोल झुके, अर्थिंग अधूरी
निरीक्षण में हरदा जिले में उपकेंद्रों पर स्पार्किंग और तेल रिसाव जैसी समस्याएं सामने आने की बात कही गई है। 11 केवी फीडर निर्माण से संबंधित उपकरण भी अधूरे पाए गए।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि डिस्मेंटल की गई पुरानी सामग्री भोपाल स्थित संबंधित भंडार तक नहीं पहुंची। कई जगह पोल झुके हुए और अर्थिंग का काम अधूरा मिला। सुरक्षा उपकरण भी मौके पर नहीं पाए गए।
अगर निरीक्षण के दौरान यह स्थिति सामने आई है तो सवाल सीधा है—काम पूरा होने से पहले भुगतान किस आधार पर किया गया और गुणवत्ता की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?
बैतूल में जमीन पर गिरे पोल और खुले में केबल
बैतूल में स्थिति और गंभीर बताई गई है। कई पोल झुके हुए मिले तो कुछ जमीन पर गिरे पाए गए।
रिपोर्ट में निर्धारित कंक्रीटिंग और दूरी के मानकों के पालन पर भी सवाल उठाए गए हैं। अर्थिंग अधूरी और केबल जमीन पर पड़ी मिली।
यह केवल तकनीकी कमी नहीं है। बिजली का ढांचा सीधे लोगों की जान-माल की सुरक्षा से जुड़ा है।
अगर करोड़ों खर्च करने के बाद भी पोल जमीन पर गिर रहे हैं तो फिर सुधार योजना का वास्तविक लाभ किसे मिला?
गुना में डीटीआर के स्ट्रक्चर भी सवालों में
गुना में वितरण ट्रांसफार्मर के स्ट्रक्चर झुके हुए पाए जाने की बात सामने आई है। मफिंग और अर्थिंग जैसी आवश्यक व्यवस्थाएं भी अधूरी बताई गई हैं।
यानी जिस ढांचे को आने वाले वर्षों के लिए सुरक्षित और मजबूत बनाया जाना था, उसी में बुनियादी तकनीकी काम पूरे नहीं हुए।
राजगढ़ में रंग कोड से लेकर क्रॉस आर्म तक गड़बड़ी
राजगढ़ में एलटी केबल का निर्धारित रंग-कोड नहीं मिलने, पेंटिंग के अभाव, मफिंग और अर्थिंग के अधूरे काम तथा कई जगह क्रॉस आर्म और बेल्टिंग एंगल नहीं लगाए जाने जैसी कमियां दर्ज होने की बात सामने आई है।
कई पोल झुकी अवस्था में पाए गए।
सवाल यह है कि क्या इन कार्यों की तकनीकी स्वीकृति और माप पुस्तिका में सब कुछ ठीक दर्ज किया गया था?
अगर हां, तो मौके पर खामियां क्यों?
और अगर मौके की खामियां सही हैं, तो भुगतान और गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं की जाए?
रायसेन में भी झुके पोल
रायसेन भी निरीक्षण में सवालों से बच नहीं पाया। यहां भी पोल झुके होने की शिकायत सामने आने की बात कही गई है।
जब एक ही प्रकार की कमियां अलग-अलग जिलों में मिल रही हों तो इसे महज स्थानीय चूक मानना मुश्किल है। यह ठेकेदार, पर्यवेक्षण व्यवस्था और विभागीय गुणवत्ता नियंत्रण की पूरी श्रृंखला पर सवाल खड़ा करता है।
सुरक्षा उपकरण गायब—किसकी जिम्मेदारी?
निरीक्षण में कई जगह नट-बोल्ट में जंग, डीटीआर पर आवश्यक सुरक्षा बॉक्स का अभाव, डेंजर बोर्ड और बाउंड्री वायर नहीं होने जैसी कमियां भी बताई गई हैं।
बिजली के ढांचे में चेतावनी और सुरक्षा उपकरण सजावटी सामान नहीं होते। इनका उद्देश्य कर्मचारियों और आम नागरिकों को संभावित दुर्घटनाओं से बचाना है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या ठेकेदारों ने सामग्री नहीं लगाई?
क्या विभागीय इंजीनियरों ने निरीक्षण नहीं किया?
क्या काम को पूर्ण बताकर भुगतान किया गया?
और यदि भुगतान हो चुका है तो खराब काम को दोबारा कौन सुधारेगा—ठेकेदार या जनता का पैसा?
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