हिमाचल प्रदेश में मानसून ने तबाही का ऐसा मंजर दिखाया है कि मौत, नुकसान और बंद सड़कों के आंकड़े डराने वाले हैं। राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र की 9 अगस्त तक की रिपोर्ट के मुताबिक 157 लोगों की मौत, करीब 257 लोगों के लापता होने और लगभग ₹886 करोड़ के नुकसान का अनुमान है। बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से करीब 900 संपत्तियों और सार्वजनिक ढांचे को नुकसान पहुंचा है।
सबसे बड़ी परेशानी सड़क संपर्क को लेकर है। भूस्खलन और बारिश के कारण 259 सड़कें बंद हैं। मंडी और कुल्लू समेत कई जिलों में यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
मौसम का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है। 12 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार राज्य में भारी बारिश का दौर जारी है और कई इलाकों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है।
सवाल सिर्फ बारिश का नहीं
हर साल मानसून में हिमाचल के पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और बाढ़ का खतरा रहता है। लेकिन बार-बार सड़कें टूटना, पुल और दूसरी आधारभूत सुविधाएं क्षतिग्रस्त होना यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण और विकास की मौजूदा नीति मौसम की बढ़ती चरम घटनाओं के अनुरूप है?
प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन नुकसान कितना होगा, यह तैयारी, निर्माण की गुणवत्ता, भूमि उपयोग और समय पर चेतावनी व बचाव व्यवस्था भी तय करती है।
हिमाचल के सामने अब सिर्फ राहत पहुंचाने की चुनौती नहीं, बल्कि यह तय करने की जरूरत है कि अगली बारिश में यही तस्वीर दोबारा न दोहराई जाए।

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