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कांवड़ में डीजे और रील्स: भक्ति बदली है या उसका सिर्फ चेहरा?

सम्पादकीय : प्रणव बजाज

कांवड़ यात्रा सदियों से आस्था, तप, अनुशासन और संकल्प की यात्रा रही है। हरिद्वार, गोमुख और दूसरे पवित्र स्थलों से गंगाजल लाकर शिवालय में अर्पित करने की परंपरा आज भी कायम है। लेकिन यात्रा का दृश्य बदल गया है। डीजे की तेज आवाज, सजी-धजी कांवड़ें, मोटरसाइकिलों के काफिले और मोबाइल कैमरों में कैद होती हर गतिविधि ने कांवड़ यात्रा को नया रूप दे दिया है।



सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या भक्ति कम हुई है या केवल उसकी अभिव्यक्ति बदल गई है?

इस सवाल का जवाब शायद डीजे या मोबाइल में नहीं, बल्कि भक्त की नीयत में छिपा है।


सनातन परंपरा स्थिरता नहीं, निरंतरता और परिवर्तन दोनों को स्वीकार करती है। शिव स्वयं इस परिवर्तन के सबसे बड़े प्रतीक हैं। वे आदियोगी भी हैं और नटराज भी। उनका स्वरूप हमें बताता है कि समय बदलता है, समाज बदलता है और पूजा-अर्चना की अभिव्यक्ति भी बदल सकती है।


जिस भक्ति को कभी ढोल-मंजीरों, लोकगीतों और कीर्तन के जरिए व्यक्त किया जाता था, वही आज डीजे और डिजिटल माध्यमों में दिखाई दे रही है। किसी युवा का कांवड़ लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना और उस यात्रा को अपने मोबाइल से साझा करना जरूरी नहीं कि उसकी श्रद्धा को कम कर दे।


लेकिन यहां एक सीमा रेखा भी है।


भक्ति की स्वतंत्रता वहां खत्म होती है, जहां से दूसरे लोगों की परेशानी शुरू होती है। तेज आवाज से बुजुर्ग, बीमार और बच्चों को परेशानी हो, यातायात बाधित हो, रास्ते रोक दिए जाएं या धार्मिक उत्साह कानून और अनुशासन की सीमा तोड़ने लगे तो सवाल डीजे या रील का नहीं, आचरण का है।


कांवड़ यात्रा तपस्या है या प्रदर्शन—यह तय करने का अधिकार किसी दूसरे को नहीं। लेकिन हर भक्त को खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि वह शिव तक पहुंचने निकला है या अपने प्रदर्शन को लोगों तक पहुंचाने?


सोशल मीडिया पर यात्रा साझा करना गलत नहीं। अपने विश्वास को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना भी गलत नहीं। समस्या तब पैदा होती है जब भक्ति पीछे छूट जाए और दिखावा आगे निकल जाए।


शिव को शोर से नहीं, भाव से प्रसन्न करने की परंपरा रही है। इसलिए कांवड़ यात्रा का नया रूप स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन उसके मूल में मौजूद संयम, अनुशासन, सेवा और समर्पण कमजोर नहीं होना चाहिए।


आखिर शिव भक्त के हाथ में कांवड़ से ज्यादा उसके मन का भार देखते हैं।


यात्रा का कलेवर बदल सकता है, साधन बदल सकते हैं, पीढ़ी की भाषा बदल सकती है—लेकिन भक्ति का अर्थ नहीं बदलना चाहिए।

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