अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति अब उन्हीं के लिए बड़ी कानूनी और वित्तीय चुनौती बन गई है। अमेरिकी सीमा शुल्क एवं सीमा सुरक्षा (CBP) ने लगभग 100 अरब अमेरिकी डॉलर का टैरिफ रिफंड प्रमाणित कर अमेरिकी वित्त विभाग को भुगतान के लिए भेज दिया है।
क्या है पूरा मामला?
सीबीपी के व्यापार कार्यक्रम निदेशालय के कार्यकारी निदेशक ब्रेंडन लॉर्ड ने अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय में दायर घोषणा में बताया कि एजेंसी ने अपने ऑटोमेटेड कमर्शियल एनवायरनमेंट (ACE) प्लेटफॉर्म में रिफंड की गणना और प्रोसेसिंग के लिए नई प्रणाली विकसित की है। इसके तहत CAPE (Consolidated Administration and Processing of Entries) सुविधा 20 अप्रैल 2026 से आयातकों और कस्टम्स ब्रोकर्स के लिए शुरू की गई।
31 जुलाई 2026 तक CAPE प्रणाली में 128.68 अरब अमेरिकी डॉलर के संभावित और प्रमाणित रिफंड स्वीकार किए जा चुके थे। इनमें से शुल्क और ब्याज सहित करीब 100 अरब अमेरिकी डॉलर का रिफंड प्रमाणित कर भुगतान के लिए अमेरिकी वित्त विभाग को भेजा जा चुका है।
लाखों आवेदन पहुंचे
सीबीपी के अनुसार, 31 जुलाई 2026 तक 2,52,496 रिफंड आवेदन जमा हुए, जिनमें से 1,78,213 आवेदन सत्यापन में सफल रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
यह पूरा मामला ट्रंप प्रशासन द्वारा 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) के तहत लगाए गए व्यापक आयात शुल्क से जुड़ा है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि IEEPA राष्ट्रपति को लगभग सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर व्यापक टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता।
नौ सदस्यीय पीठ ने 6-3 के बहुमत से यह फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत का फैसला लिखा, जबकि न्यायाधीश ब्रेट कावानाघ ने असहमति जताते हुए कहा कि इस निर्णय के परिणामस्वरूप सरकार को कई अरब डॉलर लौटाने पड़ सकते हैं।
बड़ा असर
इस फैसले के बाद अमेरिकी सरकार को भारी-भरकम टैरिफ रिफंड लौटाना पड़ रहा है। इसे ट्रंप की व्यापार नीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि जिस टैरिफ रणनीति को उन्होंने आर्थिक हथियार बनाया था, वही अब अमेरिका के खजाने पर भारी पड़ रही है।

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