विशेष संपादकीय
प्रणव बजाज
संवाद की कमी, राजनीतिक टकराव और जनता के सवालों का अधूरा समाधान !
लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि जनता की आवाज सुनने और समस्याओं का समाधान करने में होती है। आज देश की राजनीतिक तस्वीर में दो दृश्य साथ-साथ दिखाई देते हैं। एक ओर संसद है, जहां कानून और नीतियों पर चर्चा होनी चाहिए, दूसरी ओर सड़क है, जहां आम लोग अपनी मांगों और परेशानियों को लेकर आवाज उठा रहे हैं।
सवाल किसी एक सरकार या एक राजनीतिक दल का नहीं है। सवाल पूरी राजनीतिक संस्कृति का है, जहां कई बार जनता के मुद्दे राजनीतिक बहस के शोर में दब जाते हैं। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाता है और विपक्ष अपनी भूमिका निभाते हुए सरकार को घेरता है, लेकिन इन दोनों के बीच आम नागरिक के मूल सवाल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।
रोजगार, महंगाई, किसानों की चिंता, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे आज भी जनता के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल भाषणों और आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकल सकता।
संसद लोकतंत्र का मंदिर कही जाती है, लेकिन जब बहस की जगह हंगामा और नीति की जगह राजनीतिक टकराव बढ़ने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है। वहीं सड़क पर आंदोलन जनता के अधिकार का हिस्सा है, लेकिन हर समस्या का स्थायी समाधान संवाद और नीति निर्माण से ही संभव है।
आज जरूरत है कि सत्ता सुनने का साहस दिखाए और विपक्ष केवल विरोध तक सीमित न रहकर बेहतर विकल्प प्रस्तुत करे। लोकतंत्र में मजबूत सरकार जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है जवाबदेह विपक्ष और स्वतंत्र संवाद।
देश की राजनीति को टकराव से निकलकर समाधान की ओर बढ़ना होगा। संसद और सड़क के बीच की दूरी कम होगी, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा। क्योंकि लोकतंत्र की जीत किसी दल की जीत नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की जीत होती है।

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