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हर पहली बारिश में डूबता भारत: आखिर कब बदलेगा शहरों का भविष्य?

 

प्रणव बजाज

हर वर्ष मानसून की पहली तेज बारिश के साथ देश का लगभग वही दृश्य सामने आता है—सड़कों पर नदियां, घंटों जाम, डूबे हुए वाहन, बंद स्कूल, ठप अस्पताल, बिजली गुल, सीवर उफनते हुए और करोड़ों रुपये का नुकसान। गुरुग्राम, मुंबई, पुणे, सूरत, नासिक, बेंगलुरु, दिल्ली, भोपाल, इंदौर, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे बड़े शहर भी इससे अछूते नहीं हैं।


सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत हर साल केवल बारिश का इंतजार करता है या उससे निपटने की तैयारी भी करता है?

बारिश आपदा नहीं है। आपदा बनती है हमारी लापरवाही, अव्यवस्थित शहरी योजना, भ्रष्टाचार, कमजोर निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।

आखिर समस्या की जड़ क्या है?

सबसे पहला कारण है बिना दीर्घकालिक योजना के शहरों का विस्तार। नई कॉलोनियां, ऊंची इमारतें और व्यावसायिक परिसर तो बनते गए, लेकिन उनके अनुरूप जल निकासी व्यवस्था विकसित नहीं हुई।

दूसरा बड़ा कारण है नालों और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण। जिन तालाबों, नदियों और वर्षा जल के प्राकृतिक रास्तों ने दशकों तक शहरों को सुरक्षित रखा, उन्हें पाटकर निर्माण कर दिए गए। परिणामस्वरूप पानी के पास बहने का रास्ता नहीं बचता।

तीसरा कारण है घटिया निर्माण और भ्रष्टाचार। करोड़ों रुपये से बनने वाली सड़कें पहली बारिश में उखड़ जाती हैं। नालों की सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन अधिकांश नाले कचरे और गाद से भरे मिलते हैं।

चौथा कारण है अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय का अभाव। नगर निगम, विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग, जल संसाधन विभाग, स्मार्ट सिटी मिशन, बिजली कंपनियां और यातायात विभाग अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन साझा जवाबदेही तय नहीं होती।

हर साल कितना नुकसान?

पहली ही बारिश में हजारों करोड़ रुपये की सार्वजनिक और निजी संपत्ति प्रभावित होती है। उद्योगों का उत्पादन रुकता है, व्यापार प्रभावित होता है, लाखों कार्य घंटे नष्ट होते हैं, सड़कें दोबारा बनानी पड़ती हैं, बीमा दावों का बोझ बढ़ता है और सरकारों पर राहत एवं मरम्मत का अतिरिक्त खर्च आता है।

यदि देशभर के महानगरों का वार्षिक आर्थिक नुकसान जोड़ा जाए तो यह हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। यह पैसा नई सड़कें, अस्पताल, स्कूल और जल संरक्षण परियोजनाओं पर लगाया जा सकता था।

जिम्मेदारी किसकी?

केंद्र सरकार राष्ट्रीय नीतियां, वित्तीय सहायता और बड़े शहरी मिशन चलाती है। राज्य सरकारें योजनाओं को लागू करती हैं। नगर निगम और स्थानीय निकाय जमीनी स्तर पर काम करते हैं। इसलिए केवल किसी एक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या नगर निगम को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं होगा।

प्रधानमंत्री से लेकर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक, सभी स्तरों पर दीर्घकालिक शहरी सुधार को सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना होगा। राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन शहर स्थायी होते हैं। इसलिए विकास की नीति भी चुनावी नहीं, बल्कि 25–30 वर्षों की होनी चाहिए।

समाधान क्या है?

हर शहर का वैज्ञानिक वर्षा जल मानचित्र तैयार किया जाए।

सभी प्राकृतिक नालों, तालाबों और जलमार्गों से अतिक्रमण हटाया जाए।

सड़क बनने से पहले भूमिगत जल निकासी व्यवस्था पूरी की जाए।

वर्षा जल संचयन प्रत्येक बड़े भवन के लिए अनिवार्य हो।

नालों की सफाई की डिजिटल निगरानी हो और उसकी सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए

घटिया निर्माण करने वाले ठेकेदारों और लापरवाह अधिकारियों पर आर्थिक दंड के साथ आपराधिक कार्रवाई हो।

हर शहर में बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली और वास्तविक समय जलभराव निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।

स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल सुंदर सड़कें नहीं, बल्कि ऐसा शहर हो जो प्राकृतिक आपदाओं के समय भी सामान्य रूप से काम करता रहे।

जनता की भी जिम्मेदारी

नालों में कचरा फेंकना, प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग, अवैध निर्माण और जलाशयों पर कब्जा केवल सरकार की नहीं, समाज की भी समस्या है। नागरिक भागीदारी के बिना कोई भी शहर स्वच्छ और सुरक्षित नहीं बन सकता।

अब समय केवल मरम्मत का नहीं, बदलाव का है

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यदि हमें विकसित राष्ट्र बनना है तो हमारे शहर भी विकसित होने चाहिए। पहली बारिश में डूबने वाले शहर 21वीं सदी के भारत की पहचान नहीं बन सकते।

जरूरत राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर राष्ट्रीय शहरी सुधार अभियान की है। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर यदि पारदर्शिता, जवाबदेही, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक योजना के साथ काम करें तो आने वाले वर्षों में न केवल हजारों करोड़ रुपये की बचत होगी, बल्कि करोड़ों नागरिकों का जीवन भी सुरक्षित और सुगम बनेगा।

पहली बारिश हर साल एक सवाल पूछती है—क्या हम फिर वही गलती दोहराएंगे, या इस बार सचमुच बदलेंगे?

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