लोकायुक्त और ईडी क्या सो रही हैं?
संपादकीय
प्रणव बजाज
भारत में सरकारें बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं, लेकिन नौकरशाह व्यवस्था का स्थायी चेहरा बने रहते हैं। संविधान ने उन्हें निष्पक्ष, ईमानदार और जनसेवा के लिए अधिकार दिए, लेकिन समय-समय पर सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों ने यह सवाल और भी तीखा कर दिया है कि क्या नौकरशाही के भीतर जवाबदेही केवल कागज़ों तक सीमित होकर रह गई है?
हर बार जब किसी नौकरशाह के यहां आय से अधिक संपत्ति मिलने का मामला सामने आता है, जनता के मन में एक ही प्रश्न उठता है—क्या यह केवल एक व्यक्ति का मामला है, या व्यवस्था में कोई गहरी खामी है? आज आम लोगों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत होती जा रही है कि बड़ी संख्या में ऐसे अधिकारी हैं जिनकी जीवनशैली और संपत्ति उनकी घोषित आय से मेल नहीं खाती। आलीशान फार्महाउस, सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि, महंगे बंगले, लग्जरी वाहन और करोड़ों के निवेश आखिर किस आय से खड़े हुए—यह प्रश्न जवाब मांगता है।
यदि लोकायुक्त, ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियां केवल शिकायत आने का इंतजार करने के बजाय संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारियों की संपत्तियों का सक्रिय, वैज्ञानिक और नियमित परीक्षण करें, तो भ्रष्टाचार के कई बड़े नेटवर्क सामने आ सकते हैं। सवाल यह है कि क्या जांच एजेंसियां केवल चुनिंदा मामलों तक सीमित हैं, या व्यवस्था में व्यापक स्तर पर पारदर्शिता लाने की कोई ठोस रणनीति भी है?
हाल के वर्षों में कई राज्यों में भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों, लोकायुक्त, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें अधिकारियों पर उनकी ज्ञात आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगे। कई मामलों में करोड़ों रुपये की अचल संपत्ति, नकदी, सोना और निवेश का खुलासा हुआ। वहीं अनेक मामलों में जांच के बाद न्यायालयों ने दोष सिद्ध किया, जबकि कई मामलों की जांच अभी भी जारी है।
यह स्पष्ट है कि सिर्फ छापेमारी भ्रष्टाचार का समाधान नहीं है। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें हर नौकरशाह की वार्षिक संपत्ति का स्वतंत्र डिजिटल ऑडिट हो, उसकी तुलना आयकर विवरण, भूमि अभिलेख, कंपनी रिकॉर्ड और बैंकिंग लेन-देन से की जाए। यदि किसी अधिकारी की संपत्ति उसकी घोषित आय से असंगत दिखाई देती है, तो स्वतः जांच शुरू होनी चाहिए।
साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि ईमानदार नौकरशाहों की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहे। केवल आरोप लगना किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बना देता। कानून का मूल सिद्धांत है कि दोष न्यायिक प्रक्रिया से ही सिद्ध होता है।
नौकरशाही लोकतंत्र की रीढ़ है। यदि रीढ़ मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह होगी तो शासन भी मजबूत होगा। लेकिन यदि जवाबदेही कमजोर होगी, तो भ्रष्टाचार जनता के अधिकारों, विकास और लोकतंत्र—तीनों को नुकसान पहुंचाएगा।
अब समय केवल कार्रवाई का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने का है। हर नौकरशाह की संपत्ति का समयबद्ध सार्वजनिक ऑडिट, डिजिटल सत्यापन और संदेहास्पद मामलों की स्वतः जांच—यही सुशासन की असली कसौटी है। यदि व्यवस्था पारदर्शी होगी तो ईमानदार अधिकारियों का सम्मान भी बढ़ेगा और भ्रष्टाचार पर भी वास्तविक अंकुश लगेगा। जनता अब केवल भाषण नहीं, बल्कि जवाबदेही और परिणाम देखना चाहती है।

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