सिंहस्थ की उलटी गिनती, फाइलों का महाकुंभ और विकास का 'प्रतीक्षालय'
प्रणव बजाज
सिंहस्थ-2028 अब दूर नहीं है। समय किसी का इंतजार नहीं करता, लेकिन लगता है कि मध्य प्रदेश की सरकारी मशीनरी को अभी भी कैलेंडर देखने की फुर्सत नहीं मिली। दो साल से भी कम समय बचा है और अनेक परियोजनाएं अब भी रफ्तार पकड़ने का इंतजार कर रही हैं। जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं—क्या सिंहस्थ की तैयारियां समय पर पूरी होंगी या फिर आखिरी महीनों में रातों-रात विकास का चमत्कार दिखाया जाएगा?
मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए यह आयोजन सिर्फ धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि उनके शासन की सबसे बड़ी प्रशासनिक परीक्षा भी है। उज्जैन उनका गृह क्षेत्र है, इसलिए जनता की अपेक्षाएं भी कहीं अधिक हैं। सवाल यह है कि यदि यहीं योजनाएं धीमी पड़ जाएं, तो प्रदेश के बाकी हिस्सों का हाल क्या होगा?
मंत्रियों की बैठकों में लक्ष्य पूरे दिखाई देते हैं, लेकिन धरातल पर तस्वीर अलग नजर आती है। सचिवालय से लेकर विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, परियोजनाओं की निगरानी करने वाले नौकरशाह, अभियंता और मैदानी अमला—हर स्तर पर यह जिम्मेदारी है कि योजनाएं समय पर पूरी हों। यदि कहीं देरी हो रही है, तो उसका कारण सार्वजनिक होना चाहिए और जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
व्यंग्य यह है कि हमारे यहां कई बार फाइलें सड़क से तेज चलती हैं और प्रस्तुतियां पुलों से पहले तैयार हो जाती हैं। निरीक्षणों की तस्वीरें जल्दी आ जाती हैं, लेकिन काम की प्रगति पीछे रह जाती है। जनता अब शिलान्यास, समीक्षा बैठकों और बड़े-बड़े दावों से आगे बढ़ चुकी है; उसे परिणाम चाहिए।
सिंहस्थ करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का पर्व है। यह किसी सरकार, किसी मंत्री या किसी अधिकारी की निजी उपलब्धि का मंच नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। यदि तैयारियां समय पर पूरी नहीं होतीं, तो सवाल केवल सरकार से नहीं, पूरी नौकरशाही से भी पूछे जाएंगे कि आखिर समय रहते योजनाओं को गति क्यों नहीं मिली।
मोहन यादव सरकार के सामने अभी भी अवसर है कि वह केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले काम से जवाब दे। क्योंकि इतिहास भाषणों को नहीं, व्यवस्थाओं को याद रखता है। सिंहस्थ सफल हुआ तो श्रेय सरकार को मिलेगा, लेकिन यदि तैयारियां अधूरी रहीं, तो जिम्मेदारी भी सत्ता और प्रशासन—दोनों से पूछी जाएगी।

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