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प्रणव बजाज
इंदौर की जनता रोज़ घंटों जाम में फँस रही है। एमआर-9 से पलासिया तक कर्नाडिया से पलासिया तक पुरे इन्दौर में वाहनों की लंबी कतारें अब शहर की पहचान बनती जा रही हैं। एबी रोड पर निर्माण कार्य की सुस्त रफ्तार ने लाखों लोगों का समय, ईंधन और धैर्य तीनों बर्बाद कर दिया है।
विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र में विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए, वहां करीब 50 प्रतिशत हिस्से में आज भी न ढंग की सड़क है, न पर्याप्त स्ट्रीट लाइट। बरसात में कीचड़, गर्मी में धूल और हर दिन जाम—यही आम नागरिक की नियति बन गई है।
करीब 40 लाख आबादी वाला इंदौर रोज़ इस अव्यवस्था की कीमत चुका रहा है। लेकिन सत्ता के गलियारों में सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। उद्घाटन, भूमिपूजन और विज्ञापनों में विकास दौड़ रहा है, जबकि सड़कों पर वाहन रेंग रहे हैं।
व्यंग्य यही है—
"सरकार का विकास नक्शों में तेज़ है, ज़मीन पर बेहद सुस्त।"
जनता पूछ रही है—
क्या विकास केवल शिलान्यास तक सीमित रहेगा?
क्या सड़कें चुनावी भाषणों से बनेंगी या कभी धरातल पर भी पूरी होंगी?
जब तक निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं होगा और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इंदौर की सड़कें यही कहती रहेंगी—
"सरकार का काम कागज़ पर दौड़ रहा है, जनता का जीवन जाम में रुक रहा है।"

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