प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार भ्रष्टाचार पर "शून्य सहनशीलता" का दावा करती है, लेकिन आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवाल अब सरकार की छवि पर भी असर डाल रहे हैं। विपक्ष, ठेकेदारों और विभिन्न स्तरों पर उठ रही शिकायतों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि विभागीय निर्णयों से राजस्व प्रभावित हुआ, तो इसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
ठेकेदारों का आरोप है कि लाइसेंस, रूट अप्रूवल और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी के कारण कई शराब दुकानें समय पर शुरू नहीं हो सकीं। यदि इन आरोपों में तथ्य हैं, तो सरकार को संभावित राजस्व हानि हुई होगी। इन दावों की स्वतंत्र जांच अभी होना बाकी है।
आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना के नेतृत्व में विभाग के कई निर्णय चर्चा में हैं। हालांकि, अब तक किसी सक्षम जांच एजेंसी या न्यायालय ने उनके विरुद्ध किसी भ्रष्टाचार या अवैध तस्करी का आरोप सिद्ध नहीं किया है।
सरकार से पांच सीधे सवाल
क्या विभागीय निर्णयों की समीक्षा मुख्यमंत्री कार्यालय ने की?
क्या लाइसेंस और रूट अप्रूवल में देरी हुई? यदि हुई तो क्यों?
संभावित राजस्व हानि का वास्तविक आंकड़ा क्या है?
क्या पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होगी?
यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
जनता जानना चाहती है
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कई बार पारदर्शी शासन की बात कही है। ऐसे में आबकारी विभाग को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया और तथ्य सार्वजनिक करना आवश्यक है। यदि आरोप निराधार हैं तो सरकार उन्हें तथ्यों से खारिज करे, और यदि कहीं चूक हुई है तो जिम्मेदारी तय करे।
बौद्धिक प्रतिकार का सवाल:
**"आबकारी विभाग पर उठते सवालों का जवाब कौन देगा—व्यवस्था या सत्ता?"**

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