प्रणव बजाज
अयोध्या चंदा विवाद और छात्र आंदोलन के बाद भाजपा-आरएसएस की सक्रियता बढ़ी, दो लाख से अधिक बैठकों की तैयारी; विपक्ष पर नहीं, अपने समर्थक मतदाताओं की नाराज़गी पर फोकस।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का पूरा फोकस अब विपक्षी दलों पर राजनीतिक हमला करने से अधिक अपने पारंपरिक समर्थक मतदाताओं को साधने पर केंद्रित बताया जा रहा है। राजनीतिक और संगठनात्मक सूत्रों के अनुसार हाल के महीनों में अयोध्या से जुड़े चंदा विवाद और छात्र आंदोलन जैसे मुद्दों ने भाजपा के कोर समर्थक वर्ग, विशेषकर शहरी मध्यवर्ग और युवा मतदाताओं में असंतोष की चर्चा को जन्म दिया है। यही कारण है कि संघ और भाजपा ने जमीनी स्तर पर व्यापक संपर्क अभियान शुरू किया है।
सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश में अगले कुछ महीनों के दौरान दो लाख से अधिक छोटी-बड़ी संगठनात्मक बैठकों की योजना बनाई गई है। इन बैठकों का उद्देश्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचना, सरकार के पक्ष को रखना और संभावित नाराज़गी को कम करना बताया जा रहा है।
भाजपा की चिंता विपक्ष नहीं, 'घर बैठने वाला' समर्थक
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि कांग्रेस या समाजवादी पार्टी उसके समर्थकों को अपने पक्ष में कर लें, बल्कि यह है कि कहीं उसका पारंपरिक समर्थक मतदान के दिन उदासीन होकर घर न बैठ जाए। चुनावी गणित में मतदान प्रतिशत का सीधा प्रभाव परिणामों पर पड़ता है और भाजपा की रणनीति इसी जोखिम को कम करने की मानी जा रही है।
तीन करोड़ युवा मतदाता निर्णायक
उत्तर प्रदेश में लगभग 13.5 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें अनुमानित तीन करोड़ युवा (जेन-जी) मतदाता शामिल हैं। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और अवसर जैसे मुद्दे इस वर्ग के लिए प्रमुख हैं। छात्र आंदोलनों और परीक्षा संबंधी विवादों के बाद भाजपा और संघ दोनों इस वर्ग तक सीधे संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
संघ का मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उत्तर प्रदेश को संगठनात्मक दृष्टि से दो क्षेत्रों और छह प्रांतों में विभाजित किया है, जबकि भाजपा ने राजनीतिक प्रबंधन के लिए राज्य को 98 संगठनात्मक जिलों में बांटा है। गांव स्तर तक फैला यह नेटवर्क चुनावी समय में बूथ प्रबंधन, जनसंपर्क और मतदाता संपर्क अभियान का आधार माना जाता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यही संगठनात्मक संरचना भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है, जिसके कारण वह किसी भी प्रतिकूल माहौल में भी तेजी से डैमेज कंट्रोल की कोशिश करती है।
क्या विपक्ष को मिलेगा राजनीतिक लाभ?
विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष इन मुद्दों को राजनीतिक रूप से उठाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे अपनी विश्वसनीयता की चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है। शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और सांस्कृतिक मुद्दों पर विभिन्न दलों के पूर्व रिकॉर्ड को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी है। ऐसे में इन मुद्दों का चुनावी लाभ किसे मिलेगा, यह मतदाताओं के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगा।
2027 की लड़ाई का नया समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल दो प्रमुख विमर्श उभरते दिखाई दे रहे हैं—युवा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे तथा अयोध्या और सांस्कृतिक राजनीति। भाजपा इन दोनों मोर्चों पर अपने समर्थकों का भरोसा बनाए रखने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्ष इन्हें सरकार की जवाबदेही से जोड़कर चुनावी मुद्दा बनाने का प्रयास कर रहा है।
विश्लेषण
उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल विपक्ष बनाम सत्ता की लड़ाई नहीं रह गया है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक मतदाता का उत्साह और विश्वास बनाए रखना है। यदि संगठन अपने समर्थकों को पूरी तरह सक्रिय रखने में सफल रहता है तो चुनावी समीकरण अलग हो सकते हैं। वहीं यदि असंतोष मतदान प्रतिशत में कमी के रूप में सामने आया, तो उसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है।
> नोट: इस रिपोर्ट में संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक विश्लेषण का उल्लेख विभिन्न सार्वजनिक दावों, राजनीतिक चर्चाओं और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर किया गया है। अयोध्या "चंदा चोरी" जैसे आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं हैं; संबंधित मामलों में आधिकारिक निष्कर्ष आने तक इन्हें आरोप या विवाद के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

Post a Comment