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शतरंज और दसघड़ा

 


डॉ रजनीश श्रीवास्तव


   आज अंतरराष्ट्रीय शतरंज दिवस पर एक बहुत पुरानी घटना मुझे याद आ गई। वर्ष 1991 92 की बात है।


      मैं उस समय सतना जिले की अमरपाटन तहसील में पदस्थ था जो अब मैहर जिले की तहसील बन गई है।



   वहां हमारे एक प्रवाचक उमाकांत सनाढ्य जी थे।जो तहसील अमरपाटन के समीपवर्ती ग्राम परसवाही के निवासी थे। उनके द्वारा एक दिन मुझसे यह कहा गया कि मैं अवकाश के दिन में उनके घर पर भोजन ग्रहण करने के लिए आऊं।


   कुछ दिन बाद अवकाश के एक दिन मैं उनके गांव गया तो उनके घर पर भोजन के उपरांत ग्राम की सामान्य चर्चा के दौरान जब उन्हें यह पता चला कि मैं शतरंज खेलता हूं तो उन्होंने कहा कि हमारे गांव के पवाईदार साहब बैदेही सरन दुबे जी हैं वह भी शतरंज और चौपड़ भी खेलते हैं।


   फिर हम लोग उनके घर पर शतरंज खेलने के लिए गए तो यह मालूम हुआ कि वह खेल तो शतरंज जैसा ही है मगर उसका नाम दसघड़ा है। और शतरंज के बोर्ड में जैसे 8 * 8 कुल 64 खाने होते हैं उसके स्थान पर दसघड़ा के बोर्ड में 10 * 10 कुल 100 खाने होते हैं।


    सभी मोहरे शतरंज और दसघड़ा के एक जैसे होते हैं मगर दसघड़ा में 6 मोहरे अतिरिक्त होते हैं। जो एक शहजादा, एक शहजादे का वजीर,2 प्यादे और 2 हजुरा के रूप में होते हैं।


   यह अतिरिक्त मोहरे राजा के साथ एक शहजादा और उन दोनों के 2 वजीरों के रूप में होते हैं अर्थात एक वजीर के स्थान पर एक शहजादा का वजीर और एक राजा का वजीर होते हैं।


    बाकी मोहरे हाथी घोड़ा ऊंट वजीर के दोनों तरफ रहते हैं बीच के दो खाने में राजा और शहजादा रहते हैं उनके अगल-बगल एक एक वजीर और उसके बाद ऊंट घोड़ा और हाथी।


    पैदलों की संख्या 10 हो जाती है और राजा और शहजादा के ठीक सामने दो पैदल एक स्थान छोड़कर उससे आगे रखे जाते हैं और सामान्य शतरंज के उन दो पैदलों की जगह पर शहजादा और राजा के सामने जो मोहरे होते हैं उनको हजूरा कहते हैं।


    पूरा खेल शतरंज जैसा ही होता है मगर शहजादा और हजूरा की चालें अलग है।


    राजा चारों तरफ एक खाना चलता है। वजीर तिरछा और सीधा अर्थात ऊंट और हाथी की चाल चलता है।

    प्यादा एक बार में सिर्फ आगे चलता है। ऊंट तिरछा चलता है। घोड़ा ढाई घर चलता है। हाथी सीधा चलता है।


    किंतु शहजादा वजीर की तरह तिरछा व सीधा चलता है मगर इसके साथ ही घोड़े की ढाई घर की चाल भी चलता है।


   हजूरा की खासियत यह है कि वह राजा की तरह एक घर चारों तरफ चल सकता है अर्थात प्यादा या पैदल सिर्फ आगे ही बढ़ता है मगर हजुरा पीछे भी एक खाने चल सकता है।

    उस दिन हमने बैदेही शरण जी के साथ पहली बार महाभारत काल का खेल चौपड़ भी खेलना सीखा।

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