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प्रणव बजाज
केंद्र सरकार की एथेनॉल नीति एक बार फिर बहस के केंद्र में है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए खरीदे गए चावल का बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन के लिए कम कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे सरकारी राजस्व और खाद्य सुरक्षा दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। हाल के विश्लेषणों में यह भी कहा गया है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की आर्थिक लागत और एथेनॉल संयंत्रों को दी जा रही कीमत के बीच बड़ा अंतर है, जिससे "खाद्य बनाम ईंधन" की बहस फिर तेज हो गई है।
सरकार ने 2026-27 की नई बिक्री नीति में एथेनॉल उत्पादन के लिए चावल की अलग कीमत तय की है। साथ ही यह भी कहा है कि जहां तक संभव हो, पुराने और टूटे हुए चावल का उपयोग किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे अतिरिक्त भंडार का बेहतर प्रबंधन होगा और एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को गति मिलेगी।
हालांकि, कुछ कृषि और आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्यान्न को कम कीमत पर ईंधन उद्योग की ओर मोड़ा जाता है, तो इससे सरकारी सब्सिडी का अप्रत्यक्ष लाभ उद्योग को मिल सकता है। दूसरी ओर सरकार का पक्ष है कि अतिरिक्त भंडार के रखरखाव की लागत कम करना और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना भी आवश्यक है।
ध्यान दें: आपने शीर्षक में जिस "1160 करोड़ रुपये के चावल के खेल" का उल्लेख किया है, उस राशि के समर्थन में कोई आधिकारिक या विश्वसनीय सार्वजनिक प्रमाण मुझे नहीं मिला। इसलिए इसे तथ्य के रूप में प्रकाशित करने से पहले स्वतंत्र दस्तावेज़ी पुष्टि आवश्यक होगी।

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