प्रणव बजाज
भारत की न्याय व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या न्याय समय पर मिल पा रहा है? दीवानी मामलों में कई बार एक मुकदमा 20 से 30 वर्ष तक चलता है। पीढ़ियां गुजर जाती हैं, लेकिन फैसला नहीं आता। इसी कारण यह कहावत आम हो चुकी है—"तारीख पर तारीख, इंसाफ कब?
देशभर में 5 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें सबसे बड़ा बोझ जिला अदालतों पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा गति से मामलों का निपटारा होता रहा तो पूरे लंबित बोझ को खत्म करने में कई दशक लग सकते हैं।
न्याय में देरी क्यों?
जिला और उच्च न्यायालयों में हजारों न्यायिक पद खाली हैं।
अदालतों में आधारभूत सुविधाओं और कर्मचारियों की भारी कमी है।
बार-बार स्थगन (तारीख) मिलने से मुकदमे वर्षों तक खिंच जाते हैं।
सरकार स्वयं सबसे बड़ी वादी है, जिससे मुकदमों का बोझ और बढ़ता है।
पुराने दीवानी कानून और लंबी प्रक्रिया विवादों को जल्दी समाप्त नहीं होने देती।
क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप भी हैं?
समय-समय पर न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार, पक्षपात और अनुचित प्रभाव के आरोप सामने आते रहे हैं। हालांकि सभी न्यायाधीशों पर ऐसे आरोप नहीं हैं और बड़ी संख्या में न्यायाधीश ईमानदारी से कार्य करते हैं। फिर भी कुछ मामलों ने न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। विशेषज्ञों ने नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने की मांग की है।
सिस्टम इतना कमजोर क्यों माना जाता है?
न्यायाधीशों की भारी कमी।l
मुकदमों का लगातार बढ़ता बोझ।
डिजिटल ढांचे और आधुनिक प्रबंधन का अभाव।
बार-बार स्थगन की संस्कृति।
नियुक्तियों में देरी।
न्यायिक जवाबदेही पर लगातार बहस।
किन सुधारों की मांग उठ रही है?
सभी खाली न्यायिक पदों पर शीघ्र नियुक्ति।
दीवानी मामलों के लिए समयबद्ध सुनवाई।
अनावश्यक स्थगन पर कड़ी रोक।
ई-कोर्ट और डिजिटल सुनवाई का विस्तार।
न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए प्रभावी व्यवस्था।
वकल्पिक विवाद निपटान (मध्यस्थता, लोक अदालत) को बढ़ावा।
निष्कर्ष
न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए समस्याओं की चर्चा तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होना आवश्यक है। न्याय में देरी, न्यायाधीशों की कमी और लंबित मुकदमे वास्तविक चुनौतियां हैं, लेकिन किसी एक घटना के आधार पर पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट कहना उचित नहीं होगा। सुधारों का उद्देश्य न्यायपालिका को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और तेज़ बनाना होना चाहिए। तभी आम नागरिक को समय पर न्याय मिल सकेगा।

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