Top News

"दानपात्र भरा, हिसाब खाली!"

 "

मोहन सरकार में आस्था पर सवाल, जवाबदेही कौन ?

प्रणव बजाज

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में मध्य प्रदेश के कई प्रमुख मंदिरों की दान व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे हैं। अयोध्या के चढ़ावा विवाद के बाद जब मध्य प्रदेश के मंदिरों की व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हो रही है।


मध्य प्रदेश को धर्म की धरती कहा जाता है। महाकाल की नगरी, ओंकारेश्वर का आस्था धाम, खजराना गणेश, बगलामुखी और टेकरी माता जैसे मंदिरों में हर दिन लाखों श्रद्धालु सिर झुकाते हैं। भक्तों को विश्वास होता है कि उनका चढ़ाया एक-एक रुपया धर्म और जनकल्याण में लगेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि दान का पैसा कितना आया और कहाँ खर्च हुआ?

अयोध्या में चढ़ावे को लेकर विवाद के बाद देशभर में मंदिरों की व्यवस्थाओं पर चर्चा शुरू हुई। मध्य प्रदेश के कई प्रमुख मंदिरों की दान व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। कहीं सोने-चाँदी का पूरा सार्वजनिक विवरण नहीं, कहीं आय-व्यय पर पारदर्शिता की मांग, तो कहीं दान संग्रह की प्रक्रिया पर बहस।

यदि मंदिर जनता की आस्था से चलते हैं, तो उनका हिसाब भी जनता से क्यों छिपे? श्रद्धा का सबसे बड़ा आधार विश्वास है, और विश्वास का सबसे मजबूत आधार पारदर्शिता।

आज जरूरत आरोप लगाने की नहीं, बल्कि जवाब मांगने की है।

जनता पूछ रही है—

हर मंदिर की वार्षिक आय और व्यय सार्वजनिक क्यों न हो?

सोना-चाँदी और बहुमूल्य दान का स्वतंत्र लेखा-परीक्षण क्यों न कराया जाए?

दान गिनती की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग और सार्वजनिक रिपोर्ट क्यों न हो?

सभी बड़े मंदिरों का लेखा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (या अन्य सक्षम स्वतंत्र निकाय) से समय-समय पर ऑडिट क्यों न कराया जाए?

सरकार का दायित्व केवल मंदिरों का विस्तार करना नहीं, बल्कि उनकी व्यवस्था को भी भरोसेमंद बनाना है। यदि व्यवस्था पारदर्शी होगी, तो आरोप अपने आप समाप्त हो जाएंगे। यदि जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी, तो सवाल उठते रहेंगे।

मंदिरों का धन किसी सरकार, अधिकारी या ट्रस्ट का नहीं, श्रद्धालुओं की आस्था की अमानत है। इसलिए पारदर्शिता मांगना राजनीति नहीं, बल्कि जनहित और जवाबदेही का विषय है।

व्यंग्य की अंतिम पंक्ति:

"दानपात्र में श्रद्धा डालने वाला भक्त सिर्फ प्रसाद नहीं, जवाब भी चाहता है। मंदिर जितने भव्य हों, उनका हिसाब भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए—क्योंकि आस्था छिपती नहीं, पारदर्शिता से और मजबूत होती है।"

Post a Comment

Previous Post Next Post