देश विरोध की नई फैक्ट्री: विचार नहीं, ज़हर उगलने वाले ‘कीड़ों’ से सावधान

प्रणव बजाज

देश में पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर समाधान की अपेक्षा थी, लेकिन बहस का केंद्र कुछ नेताओं की बयानबाज़ी बन गया। अभिजीत दीपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए उन्हें “इन्फ्लुएंसर” बनने की सलाह दी। इससे पहले प्रियंका गांधी ने भी प्रधानमंत्री के वीडियो को लेकर तंज कसा। दूसरी ओर, कई अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी मुद्दे की गंभीरता से अधिक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को प्राथमिकता दी।



लोकतंत्र में सरकार की आलोचना पूरी तरह वैध है, लेकिन आलोचना और राजनीतिक नाटकीयता में अंतर होता है। यदि करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे पर भी बहस केवल कटाक्ष, वायरल बयान और राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित रह जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं युवाओं का होता है जिनके नाम पर राजनीति की जा रही है।

राजनीति में भाषा का स्तर जितना गिरता है, जनता का विश्वास भी उतना ही कम होता है। जनता अब भाषणों से अधिक जवाब चाहती है—पेपर लीक कैसे रुकेगा, दोषियों को सजा कब मिलेगी और परीक्षाएं पारदर्शी कैसे बनेंगी। देश किसी भी नेता से बड़ा है। जो भी नेता—चाहे सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का—लोकतांत्रिक मर्यादा से बाहर जाकर केवल विवाद पैदा करने की राजनीति करेगा, जनता को उसके शब्दों और कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए। यह व्यंग्य तीखा है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान, हिंसा या मानहानिकारक भाषा का प्रयोग नहीं करता।

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