मध्य प्रदेश में 43% आरोपी बरी, लोकायुक्त की जांच पर उठे गंभीर सवाल ?
प्रणव बजाज
भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली लोकायुक्त संस्था की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मई 2026 तक लोकायुक्त द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों में लगभग 43 प्रतिशत आरोपित अदालतों से बरी हो चुके हैं। इसके बाद जांच की गुणवत्ता, साक्ष्य संकलन और अभियोजन की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में आरोपितों के बरी होने का सबसे बड़ा कारण कमजोर विवेचना, तकनीकी खामियां, पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाना और अदालत में प्रभावी पैरवी का अभाव है। उनका कहना है कि केवल रिश्वत लेते हुए पकड़ना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि अदालत में आरोपों को ठोस प्रमाणों के साथ सिद्ध करना भी उतना ही आवश्यक है।
लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना लगातार ट्रैप कार्रवाई कर रही है और कई मामलों में अधिकारियों-कर्मचारियों को रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार भी किया गया है। इसके बावजूद अदालतों में दोष सिद्ध होने की दर अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है। इससे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
कानूनी जानकारों का कहना है कि विवेचना को वैज्ञानिक बनाने, डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्यों का अधिक उपयोग करने, गवाहों की सुरक्षा तथा अभियोजन तंत्र को मजबूत किए बिना दोषसिद्धि की दर बढ़ाना मुश्किल होगा। उनका मानना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि अदालत से सजा सुनिश्चित करना ही वास्तविक सफलता का पैमाना है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार कार्रवाई के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में बढ़ती बरी होने की दर ने लोकायुक्त की जांच प्रणाली और अभियोजन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष इसे सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था की कमजोरी बता रहा है, जबकि निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए विस्तृत आधिकारिक विश्लेषण की आवश्यकता बताई जा रही है।

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