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मेटाबोलिक सिंड्रोम लिवर पर कैसे डालता है असर? शहरी भारत में क्यों तेजी से बढ़ रहा है खतरा

 

बदलती जीवनशैली, जंक फूड और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण मेटाबोलिक सिंड्रोम शहरी भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती बन गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह केवल मधुमेह और हृदय रोग का जोखिम नहीं बढ़ाता, बल्कि लिवर को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।


मेटाबोलिक सिंड्रोम ऐसी स्थिति है जिसमें मोटापा (खासकर पेट के आसपास चर्बी), उच्च रक्तचाप, बढ़ी हुई रक्त शर्करा, ट्राइग्लिसराइड का बढ़ना और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) का कम होना जैसी समस्याएं एक साथ मौजूद होती हैं। इन कारणों से लिवर में धीरे-धीरे वसा जमा होने लगती है, जिससे फैटी लिवर की समस्या पैदा हो सकती है। समय रहते नियंत्रण न होने पर यह सूजन, लिवर फाइब्रोसिस और यहां तक कि सिरोसिस का रूप भी ले सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि महानगरों और बड़े शहरों में लंबे समय तक बैठे रहकर काम करना, फास्ट फूड का अधिक सेवन, तनाव, कम नींद और नियमित व्यायाम की कमी इस बीमारी के प्रमुख कारण हैं। यही वजह है कि शहरी आबादी में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

डॉक्टर सलाह देते हैं कि संतुलित आहार लें, रोज कम से कम 30–45 मिनट व्यायाम करें, वजन नियंत्रित रखें, मीठे पेय और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से दूरी बनाएं तथा समय-समय पर रक्त शर्करा, कोलेस्ट्रॉल और लिवर की जांच कराते रहें।

विशेषज्ञों का मानना है कि मेटाबोलिक सिंड्रोम का समय रहते पता लगाकर जीवनशैली में सुधार किया जाए तो फैटी लिवर और उससे जुड़ी गंभीर जटिलताओं के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नियमित स्वास्थ्य जांच और स्वस्थ दिनचर्या ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।

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