मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता (एजी) कार्यालय में शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्तियों को लेकर दायर जनहित याचिका ने प्रदेश की कानूनी व्यवस्था में पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट की युगलपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए नियुक्तियों से जुड़े सभी मूल रिकॉर्ड, चयन प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेज अदालत में पेश करने के आदेश दिए हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2013 की राजपत्र अधिसूचना के अनुसार शासकीय अधिवक्ता बनने के लिए कम से कम 10 वर्ष की अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस अनिवार्य है। इसके बावजूद नियुक्त किए गए कई अधिवक्ताओं के पास निर्धारित अनुभव नहीं था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि नियुक्तियां नियमों के विपरीत, मनमाने ढंग से और पक्षपातपूर्ण तरीके से की गईं।
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया। युगलपीठ ने यह आग्रह स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई तक पूरा रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश दिए। साथ ही महाधिवक्ता को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का भी आदेश जारी किया।
मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पैरवी की। अदालत अब रिकॉर्ड की जांच के बाद यह तय करेगी कि नियुक्तियां निर्धारित नियमों और पात्रता की शर्तों के अनुरूप हुई थीं या नहीं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यदि याचिका में लगाए गए आरोप रिकॉर्ड से पुष्ट होते हैं, तो शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति प्रक्रिया, पात्रता मानकों और चयन प्रणाली पर व्यापक न्यायिक समीक्षा का रास्ता खुल सकता है। वहीं यदि नियुक्तियां नियमों के अनुरूप पाई जाती हैं, तो सरकार को भी अपना पक्ष स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा। फिलहाल मामले पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।

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