एक वारंटी पर पांच साल तक मेहरबानी, दूसरे मामले में तत्काल कार्रवाई—आखिर क्यों?
प्रणव बजाज
क्या कानून सभी के लिए बराबर है? या फिर रसूखदारों के लिए पुलिस का रवैया अलग और आम लोगों के लिए अलग? इंदौर के लसूड़िया थाना क्षेत्र से सामने आए घटनाक्रम ने पुलिस व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दस्तावेजों के अनुसार, आदतन अपराधी बताए जा रहे सूरज रजक के खिलाफ वर्ष 2021 से गिरफ्तारी वारंट और वर्ष 2023 से स्थायी गिरफ्तारी वारंट लंबित था। इसके बावजूद वह वर्षों तक खुला घूमता रहा, उसके खिलाफ नए अपराध दर्ज होते रहे, लेकिन वारंट तामील नहीं हुआ। दूसरी ओर, दूसरे मामलों में वारंट की तामीली के लिए पुलिस की असाधारण सक्रियता देखने को मिली।
सबसे बड़े सवाल
पांच वर्षों तक वारंट तामील क्यों नहीं हुआ?
क्या वारंट तामील के वास्तविक प्रयास किए गए या केवल कागजों में कार्रवाई होती रही?
जब आरोपी के खिलाफ नए अपराध दर्ज हुए, तब लंबित वारंट सामने क्यों नहीं आया?
क्या वारंट की नियमित समीक्षा नहीं होती थी?
यदि होती थी, तो हर बार यह मामला कैसे छूटता रहा?
क्या प्रभावशाली लोगों के कारण कार्रवाई टाली गई?
यदि आरोपी फरार था, तो लुकआउट नोटिस या अन्य कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दोहरे मापदंड का आरोप
इसी दौरान एक अन्य मामले में वारंट तामील के लिए पुलिस की कार्रवाई विवादों में रही। आरोप लगे कि नियमों का पालन किए बिना घर में प्रवेश किया गया, जिससे पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे। अब प्रश्न यह है कि एक मामले में इतनी तत्परता और दूसरे मामले में वर्षों तक निष्क्रियता क्यों रही?
जवाबदेही किसकी?
मामला केवल थाना स्तर तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या जोन स्तर के अधिकारियों द्वारा लंबित वारंटों की समीक्षा की जाती थी? यदि हां, तो यह वारंट लगातार नजरअंदाज कैसे होता रहा?
विभागीय जांच की मांग
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि न्यायालय के आदेश के बावजूद लंबे समय तक वारंट तामील नहीं हुआ, तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष विभागीय जांच आवश्यक है। जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी या किसी प्रकार का प्रभाव कार्य कर रहा था।
बौद्धिक प्रतिकार के सवाल
क्या कानून का पालन सभी के लिए समान है?
क्या वारंट तामीली की व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा होगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?
क्या भविष्य में ऐसे मामलों की निगरानी के लिए नई व्यवस्था बनेगी?
नोट: यह रिपोर्ट आपके द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री और उसमें प्रकाशित आरोपों व दावों पर आधारित विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है। संबंधित आरोप सिद्ध नहीं हैं। अंतिम तथ्य सक्षम जांच और न्यायालय के निष्कर्षों के अधीन हैं।

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