मुंबई। भारतीय बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए एफसीएनआर (बी) (विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक) जमा योजना का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बैंकों की डॉलर फंडिंग तो मजबूत होगी, लेकिन यदि इन निधियों का लाभदायक उपयोग नहीं हुआ तो उनके मुनाफे (प्रॉफिट मार्जिन) पर दबाव बढ़ सकता है।
ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जुलाई के मध्य तक एफसीएनआर (बी) योजना के तहत 32 अरब डॉलर से अधिक की राशि जुटाई जा चुकी है। यह धन मुख्य रूप से अनिवासी भारतीयों द्वारा विदेशी मुद्रा में जमा कराया जाता है, जिससे बैंकों को डॉलर उपलब्ध होते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ब्याज दरें अपेक्षाकृत कम हैं और विदेशी मुद्रा में ऋण देने पर मिलने वाला ब्याज अंतर (स्प्रेड) भी सीमित है। ऐसे में यदि बैंक जुटाए गए डॉलर को अधिक लाभ देने वाले क्षेत्रों में नहीं लगा पाए, तो उनकी शुद्ध ब्याज आय और लाभ पर असर पड़ सकता है।
इसका प्रभाव विशेष रूप से आईसीआईसीआई बैंक और एचडीएफसी बैंक जैसे उन बड़े निजी बैंकों पर अधिक पड़ सकता है, जिनकी घरेलू फंडिंग लागत पहले से ही कम है। ऐसे बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा से जुटाई गई अतिरिक्त पूंजी पर पर्याप्त प्रतिफल अर्जित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि एफसीएनआर (बी) जमा से मिली राशि का प्रभावी उपयोग, जोखिम प्रबंधन और उचित ऋण वितरण रणनीति आने वाले समय में बैंकों की लाभप्रदता तय करेगी। यदि बैंक इन डॉलर निधियों को उच्च गुणवत्ता वाले ऋणों और विदेशी व्यापार वित्तपोषण में सफलतापूर्वक लगा सके, तो वे मुनाफे पर पड़ने वाले संभावित दबाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

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