एक बहुचर्चित पॉक्सो प्रकरण में अदालत की सुनवाई के दौरान नाटकीय मोड़ आया, जब नाबालिग बच्ची ने न्यायालय के समक्ष कहा कि उस पर अपनी मां के दबाव में पिता के खिलाफ बयान देने का दबाव बनाया गया था। बच्ची ने अदालत को बताया कि वह अपने पिता के साथ सुरक्षित महसूस करती है और उनके साथ रहना चाहती है।
सुनवाई के दौरान नाबालिग के बयान के बाद अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पूरे घटनाक्रम का संज्ञान लिया। मामले में पहले दर्ज किए गए आरोपों और अब अदालत में दिए गए बयान के बीच अंतर सामने आने के बाद जांच एजेंसियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पारिवारिक विवादों में यदि बच्चों का इस्तेमाल कानूनी लड़ाई का माध्यम बनाया जाता है, तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर पड़ता है। ऐसे मामलों में अदालतें हमेशा बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देती हैं।
यह मामला एक बार फिर इस बहस को सामने लाता है कि पॉक्सो जैसे गंभीर कानून का उपयोग पूरी संवेदनशीलता और निष्पक्षता के साथ होना चाहिए। यदि किसी भी पक्ष द्वारा झूठे आरोप या दबाव डालने की बात सिद्ध होती है, तो कानून उसके लिए भी उचित कार्रवाई का प्रावधान करता है। वहीं, अंतिम निष्कर्ष न्यायालय के निर्णय और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा।

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