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यूसीसी पर बदली बहस की दिशा? अजमेर दरगाह के दीवान बोले— "लिव-इन इस्लाम में हराम, अधिकांश मुसलमान पहले से भारतीय कानून मान रहे हैं"

 

प्रणव बजाज

राजस्थान में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही बहस के बीच अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह के दीवान और ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के अध्यक्ष सैयद नसरुद्दीन चिश्ती का बयान नई चर्चा का विषय बन गया है। अजमेर में यूसीसी प्रारूप समिति की बैठक में शामिल होकर उन्होंने न केवल यूसीसी पर संवाद की प्रक्रिया का समर्थन किया, बल्कि स्पष्ट कहा कि बिना निकाह के लिव-इन संबंध इस्लाम में हराम हैं और अधिकांश मामलों में भारतीय मुसलमान पहले से ही देश के कानून का पालन कर रहे हैं। 


राजस्थान सरकार ने पूर्व सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में यूसीसी प्रारूप समिति बनाई है, जो प्रदेशभर में लोगों से सुझाव ले रही है। समिति विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण जैसे विषयों पर जनमत जुटा रही है। 25 जुलाई तक सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।

बैठक के बाद चिश्ती ने कहा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का पहले जनता की राय लेना लोकतांत्रिक कदम है। उनका कहना था कि कुछ लोग मुसलमानों में अनावश्यक भय और भ्रम फैला रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि अपराध, महिला अधिकार, भरण-पोषण और अनेक कानूनी मामलों में मुस्लिम समाज पहले से भारतीय कानून का पालन कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया जाता है तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन उत्तराधिकार जैसे धार्मिक विषयों पर इस्लामी विद्वानों की राय भी ली जानी चाहिए। 

चिश्ती ने यह भी दोहराया कि इस्लाम में विवाह संस्था को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है और निकाह के बिना साथ रहना धार्मिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। उनका यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यूसीसी के मसौदे में लिव-इन संबंधों के पंजीकरण पर भी चर्चा हो रही है। 

दिलचस्प बात यह है कि सैयद नसरुद्दीन चिश्ती इससे पहले वक्फ संशोधन कानून का भी सार्वजनिक समर्थन कर चुके हैं। उनका तर्क था कि नए कानून से वक्फ संपत्तियों के संरक्षण और पारदर्शिता को मजबूती मिलेगी। हाल के महीनों में उन्होंने राष्ट्रीय एकता, कट्टरवाद के विरोध और संवैधानिक व्यवस्था के समर्थन में भी कई सार्वजनिक बयान दिए हैं। 

यूसीसी पर राजनीतिक और धार्मिक मतभेद जारी हैं। कुछ मुस्लिम संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं, जबकि सूफी परंपरा से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरे इसे संवाद और सहमति के आधार पर लागू करने की बात कर रहे हैं। ऐसे में अजमेर दरगाह के दीवान का यह रुख राजस्थान में यूसीसी पर चल रही बहस को नया आयाम देता है।

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