प्रणव बजाज
दतिया का उपचुनाव बड़ा अजीब है। मतदाता सोच रहा है कि वह विधायक चुनने जा रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में ऐसा माहौल है मानो भविष्य का नेतृत्व चुना जा रहा हो।
मतपत्र पर नाम भले ही आशुतोष तिवारी और घनश्याम सिंह के हों, लेकिन चर्चा इस बात की ज्यादा है कि असली जीत किसकी मानी जाएगी और हार का ठीकरा किसके सिर फूटेगा। राजनीति में कई बार उम्मीदवार सिर्फ चेहरा होता है, असली चुनाव उन चेहरों का होता है जो मंच पर कम और रणनीति की मेज पर ज्यादा दिखाई देते हैं।
दतिया इस बार विधानसभा कम, प्रयोगशाला ज्यादा बन गई है। यहां जनता मतदान करेगी, लेकिन परिणाम का विश्लेषण भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक गणितज्ञ करेंगे। कोई सीटों की गिनती करेगा, कोई संदेशों की और कोई शक्ति-केंद्रों की।
कहते हैं राजनीति में कोई खाली जगह नहीं रहती। एक सूरज ढलता है तो दूसरा उगने की तैयारी करता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां सूर्योदय भी तालियों से नहीं, चुनाव परिणाम से तय होता है। इसलिए हर नेता अपने-अपने चश्मे से दतिया को देख रहा है। किसी को यह संगठन की परीक्षा लग रही है, किसी को नेतृत्व की, तो किसी को अपने राजनीतिक भविष्य की।
अगर भाजपा जीतती है तो विजय का सेहरा किसके सिर बंधेगा, इसकी चर्चा मतदान से पहले ही शुरू हो चुकी है। और अगर हारती है, तो राजनीतिक विश्लेषकों की कलम पहले से ही जवाबदेही की सूची तैयार किए बैठी है। यही राजनीति है—जीत सामूहिक होती है, हार अक्सर व्यक्तिगत।
दतिया की जनता शायद सड़क, पानी, बिजली, रोजगार और विकास पर वोट दे। लेकिन सत्ता के गलियारों में इस चुनाव की व्याख्या प्रभाव, वर्चस्व और भविष्य के नेतृत्व की भाषा में होगी।
30 जुलाई को मतपेटी से केवल विधायक नहीं निकलेगा, बल्कि यह भी पता चलेगा कि भाजपा में अगली राजनीतिक धुरी किस दिशा में घूम रही है। दतिया का फैसला स्थानीय होगा, लेकिन उसकी गूंज प्रदेश की राजनीति में दूर तक सुनाई दे सकती है।
व्यंग्य का सार:
"दतिया में वोट विधायक के लिए पड़ेंगे, लेकिन गिने जाएंगे नेताओं के राजनीतिक कद के हिसाब से।"

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