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प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश ने देश के विकास में हमेशा अपना सबसे बड़ा योगदान दिया है। नदियां दीं, जंगल दिए, जमीन दी, लाखों लोगों का विस्थापन झेला, लेकिन जब अपने अधिकार लेने की बारी आई तो प्रदेश का नेतृत्व फिर कमजोर पड़ता दिखाई दिया।
सरदार सरोवर परियोजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है। जिस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ गुजरात को मिला, उसी परियोजना में सबसे अधिक नुकसान मध्यप्रदेश ने उठाया। दावा था कि प्रदेश को लगभग 7,669 करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे, लेकिन स्थिति ऐसी बनी कि दावा छोड़ने और उल्टे लगभग 550 करोड़ रुपये देने की सहमति की चर्चा होने लगी। यदि ऐसा हुआ है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मध्यप्रदेश ने अपने ही हितों पर 8,219 करोड़ रुपये का पानी फेर दिया?
यह केवल पैसों का मामला नहीं है, बल्कि प्रदेश के स्वाभिमान का प्रश्न भी है।
आज देश के कई मुख्यमंत्री अपनी-अपनी राज्यों की मांगों को लेकर केंद्र के सामने मजबूती से खड़े दिखाई देते हैं। कोई विशेष पैकेज मांगता है, कोई पानी के अधिकार के लिए अदालत तक जाता है, कोई अपने राज्य के हिस्से का एक रुपया भी छोड़ने को तैयार नहीं होता। लेकिन मध्यप्रदेश की तस्वीर अलग क्यों दिखाई देती है?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या एक ही दल की सरकार होने से राज्य के हितों पर समझौता आसान हो जाता है? यदि केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकार होती तो क्या मध्यप्रदेश अपने हजारों करोड़ रुपये के दावे और पानी के अधिकार पर इतनी आसानी से पीछे हट जाता?
पानी के बंटवारे पर भी वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे कि गुजरात ने तय हिस्से से अधिक पानी लिया, जबकि दूसरी ओर वाष्पीकरण का तर्क दिया गया। लेकिन जब कभी राजनीतिक मंचों पर गुजरात मॉडल की बात हुई, तब यही बताया गया कि नहरों के ऊपर सौर पैनल लगाकर बिजली भी बनाई जा रही है। यदि नहरें सौर पैनलों से ढकी थीं तो फिर अत्यधिक वाष्पीकरण का तर्क कितना ठोस है? यह तकनीकी और प्रशासनिक जांच का विषय है।
मध्यप्रदेश की जनता अब यह जानना चाहती है कि उसके अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? क्या प्रदेश का नेतृत्व हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर केवल सहमति की मुहर लगाने तक सीमित रहेगा, या फिर अपने हिस्से का पानी, पैसा और सम्मान भी मजबूती से मांगेगा?
प्रदेश के सामने आज सबसे बड़ा संकट विपक्ष नहीं, बल्कि निर्णय लेने की कमजोरी है। जब नेतृत्व अपने अधिकारों के लिए दृढ़ता से नहीं खड़ा होता, तब सबसे बड़ा नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।
मध्यप्रदेश को अब केवल घोषणाओं की नहीं, मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है—ऐसा नेतृत्व जो दिल्ली में भी प्रदेश के हितों की आवाज़ उतनी ही मजबूती से उठाए, जितनी चुनावी मंचों पर उठाई जाती है।
(टिप्पणी: यह लेख सार्वजनिक रूप से सामने आए दावों और राजनीतिक बहस पर आधारित टिप्पणी है। किसी भी वित्तीय समझौते या जल बंटवारे के अंतिम निष्कर्ष संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकरण के अभिलेखों से ही निर्धारित होंगे।)

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