आईवीएफ को लेकर फैलीं गलतफहमियां, विशेषज्ञ ने बताए 7 बड़े मिथकों का सच

 

नई दिल्ली। बदलती जीवनशैली और बढ़ती बांझपन की समस्या के बीच आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक लाखों दंपतियों के लिए उम्मीद की किरण बनी है। इसके बावजूद समाज में आईवीएफ को लेकर कई तरह की गलतफहमियां और मिथक फैले हुए हैं। प्रजनन विशेषज्ञों का कहना है कि सही जानकारी के अभाव में कई दंपति इलाज कराने से भी हिचकते हैं।



विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ा मिथक यह है कि आईवीएफ से जन्म लेने वाले बच्चे सामान्य नहीं होते, जबकि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि आईवीएफ से जन्मे बच्चे भी अन्य बच्चों की तरह सामान्य रूप से विकसित होते हैं।


दूसरा मिथक यह है कि आईवीएफ पूरी तरह असुरक्षित प्रक्रिया है। डॉक्टरों का कहना है कि प्रशिक्षित विशेषज्ञों की देखरेख में यह एक सुरक्षित और स्थापित चिकित्सा पद्धति है, हालांकि हर उपचार की तरह इसमें भी कुछ सीमित जोखिम हो सकते हैं।


तीसरी गलतफहमी यह है कि आईवीएफ हर बार पहली कोशिश में सफल हो जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि सफलता की संभावना महिला की उम्र, स्वास्थ्य, अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता सहित कई कारकों पर निर्भर करती है।


इसके अलावा कई लोग मानते हैं कि आईवीएफ केवल महिलाओं की समस्या का इलाज है, जबकि डॉक्टरों के अनुसार पुरुषों में बांझपन की स्थिति में भी यह तकनीक प्रभावी साबित हो सकती है। यह धारणा भी गलत है कि आईवीएफ केवल अधिक उम्र के लोगों के लिए है। जरूरत पड़ने पर कम उम्र के दंपति भी डॉक्टर की सलाह पर यह उपचार करा सकते हैं।


विशेषज्ञों का कहना है कि आईवीएफ को लेकर किसी भी तरह के भ्रम में आने के बजाय योग्य प्रजनन विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। सही जानकारी, समय पर जांच और उचित उपचार से कई दंपतियों का माता-पिता बनने का सपना पूरा हो सकता है।

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