देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और अगले 119 दिनों तक दैत्यराज बलि के पाताल लोक में निवास करते हैं। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते, जबकि पूजा, जप, तप, व्रत, दान और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व माना गया है।
देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी तक चलने वाली अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। यह चार महीनों का समय भगवान विष्णु की योगनिद्रा का काल माना जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने दैत्यराज बलि को वरदान दिया था कि वे वर्ष में इस अवधि के दौरान उनके लोक में निवास करेंगे। इसी कारण इस समय भगवान क्षीरसागर में नहीं, बल्कि बलि के पाताल लोक में विराजते हैं।
चातुर्मास को आत्मचिंतन, संयम और भक्ति का पर्व माना जाता है। इस दौरान साधु-संत एक स्थान पर रहकर प्रवचन, जप और साधना करते हैं। श्रद्धालु भी व्रत, सत्संग, श्रीहरि के नाम का स्मरण, गीता और भागवत का पाठ तथा दान-पुण्य कर आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, नए भवन का शुभारंभ, यज्ञोपवीत संस्कार और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान के जागरण के बाद पुनः सभी शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।
चातुर्मास के चार महीने—श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक—विशेष रूप से शिव, विष्णु, देवी और श्रीकृष्ण की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। मान्यता है कि इस काल में श्रद्धापूर्वक की गई पूजा, व्रत और दान का कई गुना पुण्य प्राप्त होता है।

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