• रवि उपाध्याय
हमारी डेमोक्रेसी इतनी वाइब्रेंट है कि अब इसमें छिपकलियां और कॉकरोच तक इंट्रेस्ट लेने लगे हैं। यह हमारी डेमोक्रेसी के समावेशी (इन्क्लूसिव) होने का एक बहुत बड़ा सबूत है। अमेरिका जब से ईरान सहित अन्य देशों के साथ युद्ध में अपने मुंह की खाने लगा है तब से मेड इन यूएस तिलचट्टा (कॉकरोच) वहां से निकल निकल कर देश की सियासत में शामिल होने के लिए हमारे यहां पहुंचने लगे हैं। दोस्तों सन् 2026 में भारत में व्हाया अमेरिका कॉकरोच जनता पार्टी (डिजिटल) लांच हुई है ।
मजेदार बात यह है कि इस लांचिंग का देश के विपक्ष ने खुली बाहों से ऐसे स्वागत किया है मानो कोई बेटा दुनिया ओलंपिक जीत कर स्वदेश वापस आ रहा हो। भला इतने सौहार्द की पॉलिटिक्स दुनियां के किसी और देश में कहीं देखी गईं है क्या ? नहीं ना। तभी तो यूं ही नही हमारे देश को अजूबों का देश कहा जाता है। सुटेड- बूटेड तिलचट्टे को देख कर फक्र होता है कि यहां के तिलचट्टे का वहां किस तरह मेक ओवर हो गया है। वह सुटेड बूटेड हो गया है।
एक हमारे यहां के काकरोच हैं साले रसोई घरों में नंगे पुंगे घूमते रहते हैं। वे इतने शर्मदार हैं कि जैसे ही कोई महिला या पुरुष किचन में प्रवेश करता है वह शरमा कर दौड़ लगा कर छुप जाते हैं।
एक यह अमेरिका रिटर्न कॉकरोच है जो कोट पेंट और टाई से सजा धजा है। यह वैसा ही है जैसे यहां का हरीलाल फॉरेन जा कर कैसे हैरी बन जाता है। रामसिंह विदेश में जा कर रेम्सन बन जाता है।
एक वह ज़माना था जब आजादी की लड़ाई के समय और उसके बाद देश की सियासत में नेताओं द्वारा टोपियां पहनी जातीं थीं। बाद में यह टोपी जनता को पहनाई जाने लगीं। उन टोपियों के रंग भले ही अलग अलग हों, पर उन सब की नियत और लक्ष्य एक ही होता है,जन सेवा के नाम पर अपने कुटुंब की सेवा। उनमे देश भक्ति लुप्त होती है। देश भक्ति का जिम्मा ख़ाकी यूनिफॉर्म के पास है। देश भक्ति और जन सेवा का काम उन्हीं के जिम्मे है। जरूरी नहीं है कि नेता में देश भक्ति हो।
पहले टोपी,नेता की पहचान हुआ करती थी। पर जैसे जैसे हमारा लोकतंत्र जवान होता गया,नेताओं की नीयत और जमाना बदला और नेताओं ने जनता को ही टोपी पहनाना शुरू कर दिया।तब से सोसाइटी में टोपी की इज्जत घटती चली गई और उसके साथ नेताओं के सिर से टोपियां भी गायब होती चली गईं। अब उन्हीं के सिर पर टोपियां शोभायमान हैं जिन के मस्तक से केश नदारद हो गए हैं। वैसे भी मस्तक की शोभा केशों से ही होती है। लेकिन आज के जमाने में आदमी की इज्जत केश से नहीं कैश से होती है। जितना कैश उतना ऐश। नेताओं ने इस मर्म को भली भांति समझा है। पहले चंदा विनम्रता और अनुरोध पूर्वक मांगा जाता था। अब अल्टीमेटम होता है।
हमारे नेताओं और लोकतंत्र के साथ अब हमारा समाज और जमाना भी मॉर्डन हो गया है। अब वो जमाना गुजर गया जब राजनैतिक दलों के चुनाव निशान समाज से जुड़े होते थे। बैलजोड़ी, गाय- बछड़ा, दीपक, शेर, हाथी हंसिया और धान की बाल या हंसिया और हथौड़ा, वट वृक्ष या झोपड़ी हुआ करता था।निर्वाचन आयोग ने अब पशु संरक्षण के नाम पर जानवरों के चुनाव निशान देना बंद कर दिया और झोपड़ी की जगह अब मल्टियां तन गईं हैं। पेड़ (वट) विकास की भेंट चढ़ गए हैं। ग्रीनरी अब गमलों और बोतलों में सिमट कर पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान दे रही है। लोग अब वृक्षों को देखने जंगल नहीं जाते। अब वे बोन्साई प्लांट देखने एक्जीविशन में जाते हैं। यही कारण है कि आदमी की सोच और दृष्टि भी बोनसाई की तरह निरंतर लघु होती जा रही है। बोनसाई की तरह।
इसी कड़ी में अब अमेरिका से फॉरेन रिटर्न चुनाव चिन्ह, सॉरी इलेक्शन सिंबल तिलचट्टा (कॉकरोच) आया है। वह पढ़ा लिखा और फॉरेन रिटर्न है। सूट और टाई पहनता है। यह सिंबल खूब मशहूर होगा, क्योंकि यह हमारे घरों में अक्सर रेंगते और दौड़ लगाते हुए अक्सर देखा जाता है। यह ऐसा इलेक्शन सिंबल है कि वोटर इसे भूल नहीं सकता, क्योंकि यदि वोटर इसको भूलने की कोशिश भी करेगा तो यह खुद को भूलने नहीं देगा। कॉकरोच और झाड़ू का बहुत ही करीबी नाता है। यह झाड़ू से ही बुहारा जाता है और उसी में छिप जाता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इसका उदगम गंदगी के साथ झाड़ू भी है। देश की राजधानी से झाड़ू गई तो यह नया एडिशन आ गया।
हमारे घरों में कॉकरोच का स्वागत चप्पल से किया जाता है। जहां वो दिखा कि हाथ में चप्पल आई और कॉकरोच आगे आगे और चप्पल पीछे पीछे। इसी बहाने घरों की महिलाओं की एक्सरसाइज हो जाती है। दूसरे कॉकरोच को मारने के लिए बाज़ार में मिलने वाली लक्ष्मण रेखा से की जाती है। इस दृश्य से माता सीता और लक्ष्मण भैया की उस घटना की याद ताजा हो गई जिसमें लक्ष्मण भैया जब भगवान राम को ढूंढने जा रहे तो उन्होंने माता सीता को आश्रम से बाहर न निकलने की हिदायत देते हुए लक्ष्मण रेखा खींची थी। अब लक्ष्मण रेखा खींच कर कॉकरोच को रोका जाता है। वाकई जमाना कितना बदल गया है।
जैसे-जैसे हमारी सियासत, लोकतंत्र, देश और नेता सयाने होते गए वैसे वैसे कृषि से पशुधनों से जुड़े दलों के चुनाव निशान गायब होते चले गए। यह हमारी पशुधन के प्रति उदासीनता का द्योतक बन गया। अब गाय सड़कों पर आवारा घूमतीं हैं और विदेशी डॉग्स घरों में पाले जाते हैं।अब तो राजनीति में हाथ की सफाई है और कीचड़ में खिलने वाला फूल है। गायों की संख्या कम होने का एक कारण यह भी है कि नेताओं की कृपा से चारा, बेचारा हो गया। खुद को गौ पालक होने का दावा करने वाले उनका चारा तक चबा गए और गाय भाई लोगों की भेंट चढ़ गईं। पर्यावरण की ये हालत है कि जब से संस्कृति गंगा जमुनी हो गई तब से न तो गंगा निर्मल बची और न ही जमुना ही पवित्र बची।
अब कॉकरोच जनता पार्टी का लोगो भी थ्री पीस सूट और टाई पहन कर नए कलेवर में हमारे सामने वाया अमेरिका से लाया गया है।इस नई पार्टी को सोशल मीडिया ने जिस तरह हाथों हाथ लिया है उससे कुछ लोगों में सियासी अखाड़े में कूदने की बेताबी लोगों में दिखाई दे रही है। वह उनका विदेशी चीजों के प्रति प्रेम को दर्शाता है। हमारे यहां के लोग इतने वेले हैं कि हर नई पार्टी के खेवनहार बनने को तैयार हो जाते हैं। भारत के सभी निठल्ले राजनीति प्राणी हो कर रह गए हैं।
ऐसा मानना है कि नेता हो या चैन स्नैचर दोनों में एक समानता होती है। ये दोनों चेन छीनते हैं। एक गले से चैन छिनता है और दूसरा जनता के जीवन से चेन छीनता है। स्नैचर को भी सुनहरी धातु के प्रति उतनी ही आसक्ति होती है जितनी सियासतदाओं को होती है। वह अब कैश नहीं गोल्ड रखते हैं।

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