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लोकतंत्र की नींव और मतदाता सूची का संकट — "जनता गायब है, लोकतंत्र मौजूद है!"The foundations of democracy and the crisis of the voter list – "The people are missing, democracy is present!"



प्रणव बजाज


लोकतंत्र बड़ा अद्भुत जीव है। यह हर पांच साल में जनता को याद करता है, हाथ जोड़ता है, पैर छूता है, गले मिलता है और चुनाव खत्म होते ही जनता को फिर से खोजने निकल पड़ता है। लेकिन अब स्थिति और भी दिलचस्प हो गई है। पहले नेता जनता को खोजते थे, अब जनता खुद अपने नाम को मतदाता सूची में खोज रही है।


देश के कई हिस्सों में मतदाता सूची पुनरीक्षण का अभियान चल रहा है। सरकारी भाषा में इसे लोकतंत्र को मजबूत करने की कवायद बताया जा रहा है। लेकिन आम नागरिक की भाषा में इसका मतलब है—"भाई साहब, आपका नाम सूची में है या लोकतंत्र से छुट्टी हो गई?"


आज हालत यह है कि कोई व्यक्ति तीस साल से एक ही घर में रह रहा है, बिजली का बिल उसी नाम से भर रहा है, संपत्ति कर दे रहा है, राशन कार्ड उसी पते पर है, आधार उसी पते पर है, लेकिन चुनाव आते ही पता चलता है कि वह लोकतंत्र का स्थायी निवासी नहीं, बल्कि अस्थायी मेहमान है।


मतदाता सूची बनाने वालों की कार्यकुशलता भी कमाल की है। जिनका निधन दस साल पहले हो चुका है, उनका नाम सूची में मुस्कुराता हुआ मिल जाता है। लेकिन जो रोज सुबह टहलते हुए बूथ तक पहुंच सकते हैं, उनका नाम रहस्यमय तरीके से गायब हो जाता है। ऐसा लगता है कि मतदाता सूची नहीं, कोई जादुई उपन्यास तैयार किया जा रहा हो, जिसमें पात्र अचानक प्रकट और अदृश्य होते रहते हैं।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वोट देने का अधिकार संविधान देता है, लेकिन उसका उपयोग करने के लिए आपको हर चुनाव में यह साबित करना पड़ता है कि आप अभी भी जीवित हैं, उसी पते पर रहते हैं और देश छोड़कर मंगल ग्रह पर नहीं चले गए हैं।


अब तो स्थिति ऐसी बन रही है कि भविष्य में मतदाता को मतदान केंद्र पर वोट डालने से पहले अपना जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल की मार्कशीट, दादा-दादी का राशन कार्ड, पड़ोसी की गवाही और बचपन की फोटो भी साथ रखनी पड़ सकती है। कहीं ऐसा न हो कि मतदान अधिकारी पूछ बैठे—"आप खुद को मतदाता साबित कीजिए।"


सबसे मजेदार बात यह है कि जब मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायत होती है, तो हर पक्ष लोकतंत्र बचाने की बात करता है। सत्ता पक्ष कहता है कि सूची को शुद्ध किया जा रहा है। विपक्ष कहता है कि लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। और बेचारा मतदाता सोचता है कि पहले मेरा नाम तो ढूंढ़ लीजिए, फिर लोकतंत्र बचा लीजिए।


लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। यह विश्वास की व्यवस्था है। नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी आवाज दर्ज है, उसका अस्तित्व मान्य है और उसका वोट सुरक्षित है। यदि लाखों लोगों को हर चुनाव से पहले अपने नाम के लिए संघर्ष करना पड़े, तो समस्या केवल सूची की नहीं, व्यवस्था की है।


नई नींव कैसी हो?


यदि सचमुच लोकतंत्र को मजबूत बनाना है तो कुछ बुनियादी बदलावों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए—



मतदाता सूची को आधार, जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन और निवास रिकॉर्ड से तकनीकी रूप से जोड़ा जाए।


किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे कई माध्यमों से सूचना देना अनिवार्य हो।


नाम हटाने का कारण सार्वजनिक और पारदर्शी हो।


ऑनलाइन आपत्ति और सुधार प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।


प्रत्येक हटाए गए नाम की स्वतंत्र समीक्षा हो।


राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों को सत्यापन प्रक्रिया में सीमित निगरानी का अधिकार मिले।


चुनाव आयोग समय-समय पर सार्वजनिक ऑडिट रिपोर्ट जारी करे।




लोकतंत्र की असली ताकत ईवीएम, बैलेट या चुनावी भाषणों में नहीं, बल्कि मतदाता सूची के उस एक नाम में छिपी होती है जो मतदान वाले दिन बूथ तक पहुंचकर अपनी उंगली पर स्याही लगवाता है। यदि वही नाम सूची से गायब हो जाए, तो लोकतंत्र की सबसे मजबूत इमारत भी खोखली लगने लगती है।


इसलिए समय आ गया है कि मतदाता सूची को केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आधारशिला माना जाए। क्योंकि जब नागरिक सूची से गायब होने लगता है, तब लोकतंत्र भी धीरे-धीरे कागजों में सिमटने लगता है।


और अंत में, लोकतंत्र की ओर से एक विनम्र सूचना—


"प्रिय नागरिक, आप वोट देने अवश्य आइए। बस पहले यह सुनिश्चित कर लीजिए कि लोकतंत्र को अभी भी याद है कि आप मौजूद हैं।"

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