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मोदी की एक गलती से मध्य प्रदेश हुआ मिट्टी पलीत?Did one mistake by Modi ruin Madhya Pradesh?

 

मोहन सरकार और दिग्विजय सरकार — क्या सचमुच एक ही व्यवस्था के दो चेहरे?

प्रणव बजाज

मध्य प्रदेश को कभी “बीमारू राज्य” कहा जाता था। फिर विकास, निवेश, सड़क, बिजली और सुशासन के बड़े-बड़े दावे हुए। लेकिन आज जब आम नागरिक की नजर से प्रदेश को देखा जाता है तो सवाल उठता है कि आखिर दशकों की सरकारों के बाद भी बिजली, पानी, सड़क और भ्रष्टाचार जैसे बुनियादी मुद्दे क्यों बने हुए हैं?


राजनीति बदलती रही, मुख्यमंत्री बदलते रहे, नारे बदलते रहे, लेकिन जनता की मूल समस्याएं क्यों नहीं बदलीं?

सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यह है कि क्या केंद्र में लगातार मजबूत जनादेश मिलने के बाद भी मध्य प्रदेश को वह प्राथमिकता मिली जिसकी अपेक्षा थी? आलोचकों का आरोप है कि प्रदेश ने लगातार एकतरफा राजनीतिक समर्थन दिया, लेकिन बदले में जवाबदेही कमजोर होती गई। यह एक राजनीतिक राय है, लेकिन इसके समर्थन में कई तथ्य और रिपोर्टें गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

सड़कों पर विकास या भ्रष्टाचार?

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश में लगभग 414 करोड़ रुपये के कथित घोटाले और फर्जी बिलों की ओर संकेत किया। रिपोर्ट में कहा गया कि 49 जिलों में सड़क निर्माण के लिए बिटुमेन खरीद के हजारों बिल संदिग्ध पाए गए। 

यानी जिन सड़कों पर जनता चल रही है, वहां गुणवत्ता और भुगतान दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं।

स्थिति इतनी चिंताजनक है कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर गड्ढों से होने वाली मौतों के मामले में मध्य प्रदेश देश के सबसे खराब राज्यों में गिना गया। रिपोर्टों के अनुसार 2020 से 2024 के बीच टोल वसूली दोगुनी हुई लेकिन गड्ढों से मौतें तीन गुना तक बढ़ गईं। 

जनता पूछ रही है — जब टोल बढ़ रहा है तो सड़कें क्यों टूट रही हैं?

पानी पर दावे और जमीन की हकीकत

इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर बताया जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में पेयजल की गुणवत्ता और वितरण व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

एक ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि इंदौर में उपचारित पेयजल का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा लीकेज और अन्य कारणों से रास्ते में ही नष्ट हो जाता है। भोपाल की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई। 

कांग्रेस ने हाल ही में दावा किया कि इंदौर में जांचे गए अधिकांश पानी के नमूनों में संक्रमण पाया गया। 

हालांकि दूसरी ओर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जल जीवन मिशन के तहत मध्य प्रदेश ने पानी की गुणवत्ता सुधारने और परीक्षण में अच्छा प्रदर्शन किया है। 

यानी कागज पर तस्वीर एक है और जमीन पर दूसरी — यही सबसे बड़ा सवाल है।

बिजली व्यवस्था का संकट

मध्य प्रदेश को कभी बिजली सरप्लस राज्य कहा गया था। लेकिन हालिया रिपोर्टों में राज्य की बिजली वितरण कंपनियों पर लगभग 71 हजार करोड़ रुपये से अधिक का संचयी घाटा बताया गया है। देश के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले डिस्कॉम राज्यों में मध्य प्रदेश की गिनती हो रही है। 

पूर्वी और केंद्रीय क्षेत्रों में बिजली वितरण हानियां राष्ट्रीय मानकों से कहीं अधिक दर्ज की गईं। 

सवाल यह है कि जब जनता महंगी बिजली खरीद रही है तो फिर कंपनियां घाटे में क्यों हैं? और यदि घाटा है तो उसकी कीमत आखिर कौन चुका रहा है?

भ्रष्टाचार — व्यवस्था की सबसे बड़ी बीमारी?

मध्य प्रदेश में समय-समय पर सामने आए मामलों ने जनता का भरोसा कमजोर किया है।

लोकायुक्त द्वारा एक सेवानिवृत्त पीडब्ल्यूडी मुख्य अभियंता के यहां छापों में करोड़ों की संपत्ति, सोना, कई संपत्तियां और अन्य चौंकाने वाली चीजें मिलने की खबरें सामने आईं। 

CAG की दूसरी रिपोर्ट में प्राकृतिक आपदा राहत राशि के करोड़ों रुपये कथित रूप से अधिकारियों और उनके रिश्तेदारों के खातों में जाने की बात सामने आई। 

जब ऐसी खबरें बार-बार सामने आती हैं तो जनता यह मानने लगती है कि सरकारें बदलती हैं लेकिन सिस्टम नहीं बदलता।

दिग्विजय से मोहन तक — क्या बदला?

दिग्विजय सिंह के शासनकाल पर विपक्ष ने वर्षों तक खराब सड़क, बिजली संकट और अव्यवस्था के आरोप लगाए।

आज विपक्ष का एक वर्ग यही सवाल मोहन यादव सरकार से पूछ रहा है कि यदि दो दशक से अधिक समय सत्ता में रहने के बाद भी जनता पानी, सड़क, भ्रष्टाचार और बिजली के मुद्दों पर परेशान है तो फिर “डबल इंजन” का लाभ कहां दिखाई देता है?

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि दोनों सरकारें पूरी तरह समान थीं, क्योंकि अलग-अलग दौर में अलग उपलब्धियां और चुनौतियां रहीं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिन मूल समस्याओं को खत्म करने का वादा किया गया था, वे आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

सबसे बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश की जनता ने बार-बार भरोसा किया।

लेकिन क्या जनता को बदले में जवाबदेही मिली?

क्या विकास केवल विज्ञापनों और आयोजनों तक सीमित रह गया?

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई केवल कुछ छापों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित है?

और सबसे महत्वपूर्ण — क्या मध्य प्रदेश को आज भी वही मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन मिला है जिसकी उसे जरूरत है?

जब तक इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तब तक जनता के मन में यही धारणा बनी रहेगी कि चेहरे बदल गए, कुर्सियां बदल गईं, लेकिन व्यवस्था का चरित्र नहीं बदला।

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Mohan Yadav

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Madhya Pradesh

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