समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, माननीय श्री न्यायमूर्ति विवेक रुसिया ने की। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विज़िटर एवं मुख्य अतिथि माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार माहेश्वरी, न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय; माननीय श्री न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा, न्यायाधीशगण, उच्चतम न्यायालय; तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन, अध्यक्ष, सशस्त्र बल अभिकरण उपस्थित रहे।
दीक्षांत भाषण देते हुए मुख्य अतिथि माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार माहेश्वरी, जो विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह से ही इसके विज़िटर रहे हैं, ने संस्थान की निरंतर प्रगति का स्मरण किया और स्नातकों का ध्यान उनके समक्ष प्रतीक्षारत जीवन की ओर आकृष्ट किया। यह प्रश्न उठाते हुए कि क्या विधि का जीवन ‘अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने योग्य’ है, महामहिम ने न्यायपीठ पर चार दशकों से अधिक के अनुभव के विश्वास के साथ उत्तर दिया कि बहुत कम ही व्यवसाय सामान्य हाथों में इतनी शक्ति देते हैं जिससे इतना भला किया जा सके। उन्होंने स्नातकों से ‘संवैधानिक कल्पनाशीलता’ विकसित करने का आग्रह किया, अर्थात् वे किसी भी विवाद के कोलाहल के पीछे उस मौन व्यक्ति को देखें जिसके अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान लिखा गया था, और स्मरण कराया कि किसी संविधान की परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह शक्तिशाली और बहुसंख्यक के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह अलोकप्रिय, शक्तिहीन और अल्पसंख्यक के साथ कैसा व्यवहार करता है। उन्होंने शक्ति के स्थान पर तर्क को न्यायालय की वास्तविक पूँजी बताया, ईमानदार असहमति की गरिमा तथा बिना द्वेष के मतभेद की बात की, और स्मरण कराया कि विधि, अपनी समस्त महत्ता के बावजूद, सीमाओं से युक्त है और बुद्धिमत्ता उन सीमाओं को जानने में निहित है।
अध्यक्षीय भाषण देते हुए कुलाधिपति माननीय श्री न्यायमूर्ति विवेक रुसिया, जो जबलपुर की ही संतान हैं और जिन्होंने मध्य प्रदेश के न्यायालयों में विधि का अभ्यास सीखा, ने स्नातकों को स्मरण कराया कि प्रत्येक फ़ाइल के पीछे एक मनुष्य होता है, और प्रायः उस जीवन का सबसे कठिन दिन। उन्होंने विधि को एक ऐसे शिल्प के रूप में वर्णित किया जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाता है, उन वरिष्ठजनों का स्मरण किया जिनके सान्निध्य में उन्होंने प्रशिक्षण लिया, और स्नातकों से आग्रह किया कि वे सामान्य पक्षकार एवं अधीनस्थ न्यायालयों का सम्मान करें, यह कहते हुए कि विधि के शासन की परीक्षा शिखर पर नहीं, अपितु आधार पर होती है। इस अवसर पर महामहिम ने एक नवीन ‘मध्यस्थता प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम: विवाद से सहमति की ओर’ के शुभारंभ की घोषणा की, जो अधिवक्ताओं एवं गैर-अधिवक्ताओं दोनों के लिए खुला है, ताकि सुलभ न्याय को न्यायालय कक्ष से परे समुदाय तक पहुँचाया जा सके। उन्होंने स्नातकों को सलाह दी कि वे विलंब के सामरिक लाभ के स्थान पर मामलों के समयबद्ध एवं ईमानदार निपटारे को महत्व दें, प्रौद्योगिकी को विधि का सेवक बनाए रखें, स्वामी कभी नहीं, और प्रत्येक क्षणिक विजय से ऊपर अपनी सत्यनिष्ठा की रक्षा करें; और ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात् जहाँ धर्म है वहीं विजय है, के साथ अपनी बात समाप्त की।
मुख्य भाषण (कीनोट एड्रेस) देते हुए माननीय श्री न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय, ने स्नातकों से उस प्रश्न की ओर दृष्टि उठाने को कहा जो उनके अनुसार उनकी पीढ़ी को परिभाषित करेगा: उनके प्रति कर्तव्य जो स्वयं अपने लिए नहीं बोल सकते। उन्होंने दो ‘मौन पक्षों’, अर्थात् अजन्मी पीढ़ी और स्वयं प्रकृति, की चर्चा की और ‘लोक न्यास सिद्धांत’ (पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन) का आह्वान किया, जिसके अनुसार वायु, नदियाँ और वन किसी सरकार या पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं, अपितु आने वाली समस्त पीढ़ियों के लिए न्यास के रूप में धारित हैं, अतः उनका अपव्यय उन लोगों के विरुद्ध विश्वासभंग है जो अभी कक्ष में उपस्थित ही नहीं हैं। इस विचार को विस्तार देते हुए महामहिम ने स्नातकों को स्मरण कराया कि उनकी अपनी विधिक शिक्षा और उससे प्राप्त शक्ति भी न्यास के रूप में ही धारित है, जिसका उपयोग निजी लाभ से अधिक के लिए किया जाना चाहिए, और उनसे ‘उत्तम न्यासी’ बनने का आग्रह किया जो उसकी रक्षा करें जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकती, और भविष्य के प्रति निष्ठा निभाएँ।
विशेष भाषण देते हुए माननीय श्री न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा, न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय, जिन्होंने अपने पदोन्नयन से पूर्व लगभग पच्चीस वर्ष अधिवक्ता के रूप में बार में व्यतीत किए, ने स्नातकों से वकालत के शिल्प के विषय में स्पष्ट रूप से बात की। उन्होंने स्मरण कराया कि मुकदमे वाक्पटुता से नहीं, अपितु तैयारी से जीते जाते हैं, कि भाषा की स्पष्टता विद्वत्ता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है, और कि अधिवक्ता को उस प्रश्न को सुनना चाहिए जो न्यायालय वस्तुतः पूछ रहा है। सर्वोपरि, महामहिम ने सलाह दी कि एक अधिवक्ता की सबसे मूल्यवान पूँजी न्यायालय में उसकी विश्वसनीयता है, जो वर्षों में धीरे-धीरे अर्जित होती है और एक ही दोपहर में नष्ट हो सकती है; क्योंकि अधिवक्ता किसी पक्षकार का प्रतिनिधि होने से पूर्व न्यायालय का अधिकारी होता है। उन्होंने स्नातकों से सभी के प्रति शिष्ट रहने का आग्रह किया, यह स्मरण कराते हुए कि चरित्र की सच्ची कसौटी यह है कि कोई व्यक्ति उनके साथ कैसा व्यवहार करता है जो बदले में कुछ नहीं कर सकते, तथा अपने शिल्प का उपयोग निजी सफलता से अधिक के लिए करें, उस पक्षकार के मामले में जो शुल्क नहीं दे सकता और बिना पारिश्रमिक के जनहित में, और इस पेशे के द्वार को व्यापक बनाएँ, क्योंकि वह न्याय जो केवल उन्हीं तक पहुँचे जिन्हें पहले से ही पहुँच प्राप्त थी, अंततः आधा न्याय ही है।
विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में संबोधन देते हुए माननीय श्री न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन, अध्यक्ष, सशस्त्र बल अभिकरण एवं विश्वविद्यालय के संस्थापकों में से एक, ने इस संस्थान को अस्तित्व में लाने और उसे विकसित होते देखने के सौभाग्य का स्मरण किया। सशस्त्र बल अभिकरण में अपने कार्य का उल्लेख करते हुए महामहिम ने ‘दिन-प्रतिदिन निष्ठापूर्वक निभाए गए कर्तव्य’ की बात की और अनुशासन पर बल देते हुए कहा कि प्रतिभा भले ही द्वार खोल दे, परंतु कक्ष में बने रहने के लिए केवल अनुशासन ही समर्थ है। उन्होंने स्नातकों को उस अदृश्य ऋण का स्मरण कराया जो उन लोगों के प्रति है जो देश की सीमाओं पर उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं ताकि शेष लोग शांति से अपना कार्य कर सकें, और इस राज्य में एक विशाल औद्योगिक आपदा के पीड़ितों को राहत पहुँचाने के अपने वर्षों का स्मरण करते हुए कहा कि न्याय, अंततः, यही सरल प्रश्न है कि क्या किसी पीड़ित मनुष्य को हमारे प्रयासों से थोड़ा कम अकेला किया जा सका।
इससे पूर्व, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार सिन्हा ने गणमान्य अतिथियों, आगंतुकों एवं परिवारजनों का स्वागत किया तथा विश्वविद्यालय का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने वर्ष की उल्लेखनीय उपलब्धियों का विवरण दिया, जिनमें जर्मनी में आयोजित नूर्नबर्ग मूट कोर्ट प्रतियोगिता में डीएनएलयू के विद्यार्थियों की अंतर्राष्ट्रीय विजय, परिसर में आयोजित अनेक राष्ट्रीय सम्मेलन एवं पुस्तक विमोचन, तथा क्लैट (CLAT) एवं ऐलेट (AILET) परीक्षाओं हेतु विश्वविद्यालय द्वारा क्षेत्रीय केंद्र के रूप में दी गई सेवा सम्मिलित हैं। प्रो. सिन्हा ने 47 शोधार्थियों सहित कुल 716 विद्यार्थियों की वर्तमान छात्र संख्या की जानकारी दी और गर्व के साथ बताया कि अब महिलाएँ छात्र समुदाय में स्पष्ट बहुमत में हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर की महत्वपूर्ण प्रगति की भी जानकारी दी, जिसमें प्रथम चरण पूर्ण हो चुका है और द्वितीय चरण तीव्र गति से प्रगति पर है, तथा मध्य प्रदेश शासन के उदार सहयोग एवं मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निरंतर मार्गदर्शन के प्रति आभार व्यक्त किया। कुलसचिव डॉ. प्रवीण त्रिपाठी ने उपाधियों एवं पदकों के वितरण का संचालन किया।
तृतीय दीक्षांत समारोह में कुल 162 स्नातकार्थियों को उपाधियाँ प्रदान की गईं: 105 को बी.ए., एल.एल.बी. (ऑनर्स), 55 को विधि स्नातकोत्तर (एल.एल.एम.), तथा 2 शोधार्थियों को पीएच.डी. की उपाधि। उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के सम्मान में स्नातक, स्नातकोत्तर एवं प्रायोजित श्रेणियों में कुल 10 स्वर्ण पदक प्रदान किए गए।
इनमें बैच टॉपर सुश्री इशिका शर्मा एवं सुश्री पूर्वा शर्मा को न्यायमूर्ति डॉ. आर.सी. लाहोटी स्वर्ण पदक (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश); अंतर्राष्ट्रीय विधि में सर्वोच्च प्रदर्शन हेतु सुश्री रश्मि मिश्रा को मीना राम स्वर्ण पदक; संवैधानिक विधि में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हेतु सुश्री पूर्वा शर्मा को वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आर.पी. अग्रवाल स्मृति स्वर्ण पदक; तथा विधिशास्त्र (जुरिस्प्रूडेंस) हेतु श्री वासुजित दुबे को डॉ. बाजी नाथ शर्मा स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। विशेष विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों में सुश्री पूर्वा शर्मा (बी.ए. एल.एल.बी. ऑनर्स, विश्वविद्यालय टॉपर), सुश्री इशिका शर्मा (एल.एल.एम. विश्वविद्यालय टॉपर), सुश्री साक्षी पांडे (एल.एल.एम. आपराधिक विधि एवं मानवाधिकार), सुश्री प्रगति राजक (एल.एल.एम. जनरल टॉपर), तथा सुश्री इशिका शर्मा (एल.एल.एम. व्यापार विधि एवं बौद्धिक संपदा अधिकार) सम्मिलित रहीं।
दीक्षांत समारोह के दौरान ‘प्रोसीजरल जुरिस्प्रूडेंस ऑफ जस्टिस आर.सी. लाहोटी: ए थीमैटिक स्टडी ऑफ हिज़ लॉर्डशिप्स डिसीज़न्स ऑन द कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर’ नामक एक पुस्तक का विमोचन भी किया गया। डॉ. प्रवीण त्रिपाठी एवं श्री देवमणि बंसल द्वारा संपादित, माननीय श्री न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की भूमिका सहित तथा सत्यम लॉ इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक, न्यायमूर्ति लाहोटी द्वारा वर्ष 1988 से 2005 के मध्य मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय एवं भारत के उच्चतम न्यायालय में दिए गए निर्णयों पर आधारित है।

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