देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में गिने जाने वाले को लेकर लगातार उठ रहे सवाल अब केवल प्रशासनिक विवाद तक सीमित नहीं रह गए हैं। हाल के घटनाक्रमों ने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां बन रही हैं, जिनकी वजह से अनुभवी और नामी डॉक्टर संस्थान से दूरी बना रहे हैं या खुद को असहज महसूस कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से संस्थान के कुछ विभागों में मरीजों के भर्ती, स्थानांतरण और छुट्टी प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। आरोप हैं कि इन व्यवस्थागत खामियों का असर मरीजों की देखभाल से लेकर विभागीय जांच और अस्पताल के रिकॉर्ड तक पर पड़ा।
डॉ. ए.के. बिसोई का मामला चर्चा में
देश के जाने-माने हृदय शल्य चिकित्सक से जुड़ा मामला अब संस्थान की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। सूत्रों का दावा है कि उन्होंने प्रशासनिक जवाबदेही और मरीज हित से जुड़े मुद्दों को लेकर आवाज उठाई थी। यह भी कहा जा रहा है कि इन मामलों की जानकारी तत्कालीन निदेशक को भी दी गई थी।
इसी बीच एक महिला नर्स की शिकायत के आधार पर मामला नया मोड़ लेता है। बताया गया कि नर्स ने अपने पत्र में कार्य दबाव और कामकाज में कठिनाइयों का जिक्र करते हुए स्थानांतरण की मांग की थी। आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर समाधान निकालने के बजाय मामला यौन उत्पीड़न जांच तक पहुंच गया और आंतरिक शिकायत समिति को भेजा गया।
हालांकि बाद में आंतरिक शिकायत समिति ने अपनी रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बावजूद पूरा विवाद लंबे समय तक चर्चा में बना रहा।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल
सूत्रों का दावा है कि विभागीय प्रशासन और कंप्यूटर आधारित कई जिम्मेदारियां उसी नर्स के पास थीं, जिससे मरीजों की देखभाल और कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठे। कुछ लोगों का मानना है कि जिन मुद्दों को डॉ. बिसोई उठा रहे थे, उनसे ध्यान हटाने के लिए विवाद को अलग दिशा दी गई। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पूरा मामला अब संस्थान की पारदर्शिता, प्रशासनिक निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर बहस का कारण बन गया है।
समीक्षा बैठक पर भी विवाद
सूत्रों के अनुसार 10 मार्च को आयोजित एक समीक्षा बैठक को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आरोप हैं कि बैठक की कार्यवाही सार्वजनिक नहीं की गई और संबंधित पक्षों को पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
इसी बीच यह चर्चा भी तेज है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी कुछ निर्देशों के पालन को लेकर गंभीर मतभेद बने रहे। हालांकि सरकार या संस्थान की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
संस्थान की साख पर असर
विशेषज्ञ मानते हैं कि देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों में यदि डॉक्टर खुद को असुरक्षित या प्रशासनिक दबाव में महसूस करेंगे तो इसका सीधा असर चिकित्सा व्यवस्था और मरीजों के भरोसे पर पड़ेगा। एम्स केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में लगातार उठते विवाद संस्थान की छवि और विश्वसनीयता दोनों के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं।

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