सम्पादकीय
देश की राजनीति इन दिनों ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां सत्ता परिवर्तन केवल सरकार बदलने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं, संवैधानिक संस्थाओं और जनादेश की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। तीन राज्यों में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अब राजनीति केवल जनता के वोट से नहीं, बल्कि जोड़तोड़, दबाव, रणनीति और सत्ता संतुलन के नए खेल से भी तय होने लगी है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि जनता जिस उम्मीद और भरोसे के साथ मतदान करती है, वही भरोसा बार-बार टूटता दिखाई देता है। चुनाव के दौरान नेता जनता के सामने विचारधारा, सिद्धांत और जनसेवा की बातें करते हैं, लेकिन सत्ता के समीकरण बदलते ही वही नेता कल तक जिनके खिलाफ भाषण देते थे, आज उनके साथ मंच साझा करते दिखाई देते हैं। जनता सोचती रह जाती है कि आखिर उसका मत किसके लिए था और सत्ता किसके हाथ चली गई।
विपक्ष की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में सवालों के घेरे में है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष को जनता की आवाज माना जाता है, लेकिन कई बार विपक्ष केवल अवसर तलाशने वाली राजनीति में उलझ जाता है। जहां उसे जनता के मुद्दों पर संघर्ष करना चाहिए, वहां वह सत्ता के समीकरण साधने में व्यस्त दिखता है। यही कारण है कि जनता का भरोसा धीरे-धीरे राजनीतिक दलों से कमजोर होता जा रहा है।
राजनीति का सबसे खतरनाक रूप तब सामने आता है जब जनादेश को नैतिकता के बजाय गणित से तौला जाने लगे। विधायकों की गिनती लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन यदि पूरी राजनीति केवल संख्या जुटाने तक सीमित हो जाए तो विचारधारा, नीति और जनता का हित पीछे छूट जाता है। लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब सरकारें जनता के भरोसे नहीं, बल्कि राजनीतिक सौदेबाजी से बनती और गिरती हैं।
आज स्थिति यह है कि दल बदल अब विचारधारा का नहीं, अवसर का माध्यम बन चुका है। जो नेता कल तक किसी दल को भ्रष्ट बताते थे, वही आज सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए उसी दल के साथ खड़े नजर आते हैं। जनता इस दोहरे चरित्र को देख रही है और समझ भी रही है। यही वजह है कि राजनीतिक व्यवस्था के प्रति नाराजगी और अविश्वास बढ़ रहा है।
व्यंग्य यह है कि हर दल लोकतंत्र बचाने का दावा करता है, लेकिन लोकतंत्र सबसे ज्यादा राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षा के बीच ही घायल होता दिखाई देता है। सत्ता पक्ष कहता है कि सब कुछ संवैधानिक तरीके से हो रहा है, जबकि विपक्ष लोकतंत्र खतरे में होने की बात करता है। दिलचस्प यह है कि जब भूमिकाएं बदलती हैं तो बयान भी बदल जाते हैं। कल जो खरीद-फरोख्त कहते थे, आज उसे राजनीतिक रणनीति बताते हैं।
जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने तक सीमित रह गया है, या फिर जनभावना, नैतिकता और राजनीतिक जवाबदेही भी उसकी आत्मा हैं। यदि राजनीति केवल सत्ता तक पहुंचने का माध्यम बनती रही तो लोकतंत्र का ढांचा भले मजबूत दिखाई दे, उसकी आत्मा धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी।
देश को आज ऐसी राजनीति की जरूरत है जो सत्ता परिवर्तन को लोकतांत्रिक प्रक्रिया माने, न कि राजनीतिक खेल। विपक्ष को भी केवल विरोध नहीं, बल्कि विश्वसनीय विकल्प बनना होगा। क्योंकि लोकतंत्र केवल सरकार से नहीं चलता, बल्कि मजबूत विपक्ष, जागरूक जनता और जवाबदेह राजनीति से जीवित रहता है।

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