सम्पादकीय
देश में इन दिनों विदेशी मुद्रा बचाने का नया अभियान चल रहा है। प्रधानमंत्री Narendra Modi जनता से कह रहे हैं कि पेट्रोल बचाइए, गैरजरूरी यात्राएं टालिए, घर से काम कीजिए, क्योंकि देश पर वैश्विक संकट का खतरा मंडरा रहा है। सुनने में यह अपील जिम्मेदार और राष्ट्रहित वाली लगती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ आम जनता की है?
देश का मध्यमवर्ग पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते टैक्स के बोझ तले दबा हुआ है। पेट्रोल-डीजल के दाम उसकी कमर तोड़ चुके हैं। अब उसे यह भी बताया जा रहा है कि देशभक्ति साबित करनी है तो अपनी बाइक कम चलाओ, घूमना बंद करो और खर्च घटाओ। यानी हर संकट का समाधान अब आम आदमी की जेब से ही निकलेगा।
मगर दूसरी तरफ तस्वीर बिल्कुल अलग है। नेताओं के सैकड़ों गाड़ियों वाले काफिले सड़कों पर फर्राटे भर रहे हैं। स्वागत के नाम पर पेट्रोल पानी की तरह बहाया जा रहा है। सरकारी आयोजनों में चमक-दमक और दिखावे पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं। सत्ता की शान में कहीं कोई कटौती दिखाई नहीं देती।
विडंबना देखिए, जनता से कहा जा रहा है कि विदेशी मुद्रा बचाइए, लेकिन सत्ता के गलियारों में फिजूलखर्ची का उत्सव जारी है। क्या विदेशी मुद्रा सिर्फ आम आदमी के स्कूटर से खर्च होती है? क्या नेताओं के काफिले हवा से चलते हैं? क्या सरकारी ठाठ-बाट में डीजल नहीं जलता?
असल समस्या यह नहीं कि सरकार बचत की अपील कर रही है। समस्या यह है कि त्याग हमेशा जनता से मांगा जाता है और सुविधा हमेशा सत्ता के हिस्से आती है। जनता लाइन में खड़ी रहे, टैक्स भरे, खर्च कम करे, लेकिन सत्ता अपनी शानो-शौकत में कोई कमी न आने दे—यही नया आर्थिक मॉडल बनता जा रहा है।
अगर सरकार सच में चाहती है कि देश विदेशी मुद्रा बचाए, तो शुरुआत ऊपर से होनी चाहिए। मंत्रियों के काफिले छोटे हों, सरकारी खर्चों में कटौती हो, दिखावे की राजनीति बंद हो। क्योंकि जनता अब सिर्फ भाषण नहीं, उदाहरण देखना चाहती है।

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