पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव नतीजों के बाद नया सियासी संग्राम शुरू हो गया है। ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है और हार स्वीकार करने से भी साफ मना कर दिया है। उनके इस रुख के बाद राज्य में सरकार गठन को लेकर स्थिति दिलचस्प हो गई है।
संवैधानिक प्रक्रिया के तहत अगर किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता देते हैं। अगर तृणमूल कांग्रेस बहुमत साबित नहीं कर पाती, तो विपक्षी दलों को मौका मिल सकता है। वहीं, अगर किसी दल के पास पर्याप्त संख्या नहीं होती, तो गठबंधन की राजनीति शुरू हो सकती है।
ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल विधानसभा में बहुमत साबित करना सबसे अहम होता है। राज्यपाल एक निश्चित समय सीमा देते हैं, जिसके भीतर मुख्यमंत्री को सदन में विश्वास मत हासिल करना होता है। अगर यह संभव नहीं होता, तो दूसरी पार्टी या गठबंधन को मौका दिया जाता है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, मौजूदा हालात में जोड़-तोड़ और समर्थन जुटाने की कोशिशें तेज हो सकती हैं। निर्दलीय विधायकों और छोटे दलों की भूमिका भी निर्णायक बन सकती है।
यदि कोई भी दल बहुमत साबित करने में सफल नहीं होता, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की नौबत भी आ सकती है। ऐसे में केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ जाती है और विधानसभा को भंग भी किया जा सकता है।
ममता बनर्जी के सख्त रुख ने साफ कर दिया है कि बंगाल की सियासत में आने वाले दिनों में घमासान और तेज होगा, जहां हर दल सरकार बनाने के लिए पूरी ताकत झोंकेगा।

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