मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने देश की सरकारी तेल कंपनियों पर भारी दबाव बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होने के बावजूद पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम नियंत्रित रखने की वजह से सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को रोजाना करीब 1,600 से 1,700 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक पिछले लगभग 10 हफ्तों में इन कंपनियों का कुल नुकसान 1 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। सबसे ज्यादा असर पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री करने वाली सरकारी कंपनियों पर दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है। लेकिन आम लोगों पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ न पड़े, इसलिए फिलहाल कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से बचा जा रहा है।
सरकारी तेल कंपनियों में , और प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस सिलेंडर पर बढ़ती अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहा और कच्चा तेल महंगा ही रहा, तो सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी—एक तरफ महंगाई को नियंत्रित रखना और दूसरी तरफ तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति संभालना।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में सरकार तेल कंपनियों को राहत देने के लिए सब्सिडी, टैक्स में कटौती या अन्य वित्तीय सहायता जैसे कदम उठा सकती है। फिलहाल बाजार की नजर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हुई है।

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