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काम की जगह या खतरे का मैदान?Workplace or danger zone?



“सुरक्षा” के नाम पर लापरवाही का खेल, आज फिर याद दिला रहा है विश्व कार्यस्थल सुरक्षा दिवस

आज विश्व कार्यस्थल सुरक्षा एवं स्वास्थ्य दिवस है — लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है? हर साल 28 अप्रैल को भाषण, पोस्टर और वादों की बारिश होती है, मगर जमीनी हकीकत में मजदूर अब भी बिना सुरक्षा के मौत से जूझ रहा है।

इस दिवस की शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2003 में की थी, ताकि कार्यस्थलों पर होने वाली दुर्घटनाओं और बीमारियों को रोका जा सके। लेकिन भारत जैसे देशों में आज भी हालात यह हैं कि फैक्ट्रियों, निर्माण स्थलों और छोटे उद्योगों में सुरक्षा नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।

हर दिन हादसे, फिर भी चुप्पी क्यों?

देशभर में हर साल हजारों मजदूर काम के दौरान घायल होते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं। हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट, फायर सिस्टम — सब कुछ “दिखावे” के लिए होता है। निरीक्षण के नाम पर लीपापोती और भ्रष्टाचार का खेल खुलकर चलता है।

इस साल का थीम भी एक कड़वी सच्चाई

इस बार का विषय है —

“अच्छा मनोसामाजिक कार्य वातावरण: श्रमिकों की उन्नति और मजबूत संगठन का मार्ग”

मतलब साफ है — अब खतरा सिर्फ मशीनों से नहीं, बल्कि तनाव, मानसिक दबाव, ओवरवर्क और उत्पीड़न से भी है।

कॉरपोरेट दफ्तरों से लेकर फैक्ट्रियों तक, कर्मचारी “टारगेट” और “प्रेशर” के नीचे दबकर टूट रहा है।

सवाल सीधे सरकार और सिस्टम से

क्या वजह है कि सुरक्षा कानून होने के बावजूद उनका पालन नहीं होता?

क्यों हर हादसे के बाद सिर्फ मुआवजा देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है?

और आखिर कब तक मजदूरों की जान सस्ती बनी रहेगी?

हकीकत बदलनी होगी, वरना ये दिवस बेकार

सिर्फ एक दिन जागरूकता दिखाने से कुछ नहीं होगा। जरूरत है सख्त निगरानी, ईमानदार कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की। जब तक नियम तोड़ने वालों पर कड़ी सजा नहीं होगी, तब तक “सुरक्षा” सिर्फ एक शब्द ही रहेगा।

आज का दिन सिर्फ मनाने का नहीं, सिस्टम को आईना दिखाने का है — क्योंकि अगर काम करने वाला ही सुरक्षित नहीं, तो विकास का हर दावा झूठा है।

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