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महंगाई की आग में जलती जनता, “सब कंट्रोल में है” का सरकारी दावा ?The Public Scorched by the Flames of Inflation—Met with the Government's Claim That "Everything Is Under Control"?

 

इंदौर/ प्रणव बजाज

देश में महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उससे गरीब और मध्यम वर्ग की कमर टूट चुकी है। रसोई गैस, दाल, तेल, सब्ज़ियां, स्कूल फीस, इलाज—हर ज़रूरत की चीज़ आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदारों के मुताबिक “महंगाई नाम की कोई समस्या है ही नहीं”।


आंकड़े कुछ और कहते हैं, दावे कुछ और

बाजार के हालात देखें तो—

रसोई गैस सिलेंडर 1100 रुपये के पार

खाने का तेल 150-180 रुपये लीटर

दालें 120-200 रुपये किलो

सब्ज़ियों के दाम रोज़ बदलते “शेयर मार्केट” जैसे

इसके बावजूद आधिकारिक बयान यही—

* “महंगाई नियंत्रित है”

“जनता पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं”

 फिर महंगाई है किसे?

अगर सरकार की मानें तो—

महंगाई डेटा में नहीं है

जनता की जेब में भ्रम है

बाजार में अफवाह है

यानि आम आदमी जो रोज़ महंगाई झेल रहा है, वो शायद “मानसिक दबाव” में है, असलियत में सब सस्ता ही है!

रसोई से सड़क तक असर

महंगाई का असर सबसे ज्यादा दिख रहा है—

गरीब परिवारों की थाली में (दाल-सब्ज़ी गायब)

मध्यम वर्ग की बचत में (EMI और खर्च का संतुलन बिगड़ा)

छोटे व्यापारियों की बिक्री में (ग्राहक कम, खर्च ज्यादा)

एक गृहिणी का कहना है—

“पहले 2000 रुपये में हफ्ते का सामान आ जाता था, अब 4000 भी कम पड़ते हैं। लेकिन टीवी पर सुनते हैं कि सब ठीक है।”

 कारण क्या हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार महंगाई के पीछे कई कारण हैं—

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत

सप्लाई चेन में बाधाएं

टैक्स और ड्यूटी का दबाव

जमाखोरी और कालाबाज़ारी

स्थानीय स्तर पर नियंत्रण की कमी

लेकिन इन कारणों पर ठोस कार्रवाई कम और बयानबाज़ी ज्यादा दिख रही है।

“सब चंगा सी” का दौर

राजनीतिक बयान अब कुछ ऐसे हैं—

“देश तरक्की कर रहा है”

“जनता खुश है”

“महंगाई विपक्ष का प्रोपेगेंडा है”

*ऐसे में सवाल उठता है—

 अगर महंगाई नहीं है, तो फिर जनता क्यों परेशान है?

 अगर सब ठीक है, तो फिर थाली क्यों खाली हो रही है ।

महंगाई की आग में जलती जनता को अब शायद यह समझ लेना चाहिए कि—

समस्या महंगाई नहीं, बल्कि “महंगाई को महसूस करना” है।

 अगर आप महंगाई नहीं मानेंगे, तो महंगाई अपने आप खत्म हो जाएगी!

जब तक आंकड़ों की दुनिया में सब ठीक है, तब तक जमीन पर बिगड़ती हालत शायद “नज़र का धोखा” ही मानी जाएगी।

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