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देश में मजदूरों की जिंदगी पर सबसे बड़ा खतरा अब काम ही बनता जा रहा है। सिलिका डस्ट यानी महीन धूल के कारण लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों मजदूर धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। अनुमान है कि 2025 तक ऐसे मजदूरों की संख्या 5 करोड़ से ज्यादा हो सकती है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के नोएडा में मजदूरों का आंदोलन इसी दर्द को सामने लाया। मजदूरी बढ़ाने के साथ उन्होंने काम के हालात सुधारने की मांग की, क्योंकि खराब वर्किंग कंडीशन ही उनकी सेहत और जान दोनों के लिए खतरा बन चुकी है।
भारत में स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि करीब 90 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यहां सुरक्षा के नियम या तो लागू नहीं होते या फिर उनका पालन नहीं होता। मजदूर बिना मास्क, बिना सुरक्षा उपकरण के धूल, केमिकल और खतरनाक मशीनों के बीच काम करने को मजबूर हैं।
विश्व स्तर पर भी यह समस्या बड़ी है। World Health Organization और International Labour Organization के आंकड़ों के अनुसार 2016 में काम से जुड़े खतरों के कारण करीब 18.7 लाख लोगों की मौत हुई। इनमें से 81 प्रतिशत मौतें हादसों से नहीं, बल्कि बीमारियों से हुईं—यानी धीरे-धीरे होने वाली मौतें।
भारत में हालात और चिंताजनक हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक काम से जुड़ी चोटों से होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा 45 फीसदी तक है, जबकि occupational diseases से होने वाली मौतों में भी बड़ी हिस्सेदारी है।
खेती और उससे जुड़े कामों में लगे लोगों की हालत भी बेहतर नहीं है। करीब 60 फीसदी आबादी इस क्षेत्र में काम करती है और इनमें से 97 प्रतिशत से ज्यादा लोग किसी न किसी तरह के शारीरिक नुकसान का सामना करते हैं। मशीनों, केमिकल और जैविक खतरों का असर उनकी सेहत पर लगातार पड़ रहा है।
सिलिका डस्ट का खतरा सबसे ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है। पत्थर काटने, खदानों, कंस्ट्रक्शन और फैक्ट्री जैसे 90 से ज्यादा काम ऐसे हैं जहां यह धूल सीधे फेफड़ों में जाकर बीमारी पैदा करती है। इससे सिलिकोसिस, टीबी और यहां तक कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है, उन्हीं के पास इलाज की सबसे कम सुविधा है। Employees' State Insurance Corporation जैसी योजनाएं केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित हैं, जबकि असली खतरा असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूरों को है।
देश की स्वास्थ्य व्यवस्था भी इस चुनौती से पूरी तरह निपटने में सक्षम नहीं दिखती। अधिकतर डॉक्टर शहरों में हैं, जबकि मजदूरों की बड़ी आबादी गांवों और छोटे कस्बों में रहती है। ऐसे में समय पर इलाज मिल पाना मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में यह एक बड़ा हेल्थ क्राइसिस बन सकता है।

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