- मानसश्री डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रिया।।"
(मनु स्मृति
भारतीय समाज में नारी एक विशिष्ट गौरवपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित है। जैसा इस श्लोक में स्पष्ट है कि जिस समाज में स्त्रियों का सम्मान आदर होता है, वहां देवता प्रसन्न रहते हैं और इसके विपरीत जहां ऐसा नहीं होता है उस समाज-परिवार में समस्त क्रियाएं व्यर्थ रहती हैं। भारतीय संस्कृति में पुरुष ने सदा ही उसे अपनी अर्द्धांगिनी एवं बायाँ हाथ मानकर उसे समाज में श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। साथ ही साथ व्यवहार में पुरुष-मर्यादा से नारी मर्यादा सदा ही उत्कृष्ट मानी गयी है। भारतीय संस्कृति में नारी-समाज के प्रति यह केवल शाब्दिक सद्भावना का प्रदर्शन ही नहीं है, अपितु भारतीय गृहस्थ जीवन में पदे-पदे इनकी व्यावहारिकता सार्थकता सिद्ध है।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय नारी कहीं कम नहीं है। विश्व में एक ही नहीं दो भारतीय नारियों ने चन्द्रमा पर पहुंचकर विजय का झंडा फहराया है यथा प्रथम कल्पना चावला तो दूसरी सुनीता विलियम्स। आज विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जोरदार स्वागत कर उसके मान-सम्मान का ढिढोरा पीटा जा रहा है, किन्तु भारतीय संस्कृति आदिकाल से ही नारी को पुरुष के बराबर का दर्जा देने में कभी भी विमुख नहीं हुई। समाज में ईश्वर भक्ति में भी राधाकृष्ण तो सीताराम का नाम लेकर नारी श्रेष्ठता का बिगुल बजाता रहा है।
स्वयं गांधीजी ने नारी का सम्मान व श्रद्धा से उसे अपने जीवन भर प्रतिष्ठा दिलवायी। वे अंधेरे में जाने से डरते थे तब उनकी माता पुतलीदेवी ने भगवान का नाम लेकर सामना करने को कहा। गांधीजी जीवन भर इस बात को माता का उपदेश मानकर अंधेरा ही नहीं कठिनाइयों से भी सामना करते रहे। उनकी माता ही उनकी शक्ति का प्रमुख स्रोत रही हैं।
अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति स्व. अब्राहम लिंकन ने भी एक स्थान पर लिखा है कि, "आज मैं जो कुछ भी हूँ या होने की कामना करता हूँ उसका सम्पूर्ण श्रेय देवी स्वरूप मेरी माता को ही है"। आज नारी विश्व के समस्त क्षेत्रों में, कई क्षेत्रों में पुरुषों से भी अग्रणी है। शिक्षा के समस्त क्षेत्रों में विशेष योग्यता की सूची में देखें तो पुरुषों की अपेक्षा नारी (लड़कियों) की संख्या व स्थान तुलनात्मक ज्यादा ही है।
पाश्चात्य विद्वानों का मत था कि उनके देश की नारियां बहुत आगे हैं किन्तु यह धारणा एक पक्षीय ही रही है। साहित्य के क्षेत्र में यदि रत्नावली न होतीं तो रामचरित मानस जैसे महान ग्रंथ के रचयिता तुलसीदासजी न होते। संस्कृत साहित्य में विद्योत्तमा जैसी विदुषी नारी ने कालिदास जैसे महाकवि को उत्कृष्ट संस्कृत साहित्य के सृजन के लिये प्रेरित किया। अति प्राचीनकाल में जब भारत सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान का प्रकाश पुंज फैला रहा था उस समय की विदुषियों को आज के इस प्रसंग पर हम विस्मृत नहीं कर सकते हैं, जिनमें प्रमुख हैं गार्गी, मैत्रेयी, अपला, अदिति, इन्द्राणी, सावित्री आदि कई नाम विशेष रूप से उल्लेखित हैं। इन्होंने पुरुषों के साथ वेदों की ऋचाएं सृजित की हैं। इनका नाम लेते ही हमारा मस्तक गौरवान्वित हो जाता है।
संसार के इस परिवर्तनशील चक्र में नारी का कठोर व्यवहार भी मानव जीवन में आशीर्वाद एवं प्रेरणा स्रोत बनकर उसको महान व्यक्ति बनाने में सहायक रहा है यथा - संत भक्त कवि नरसी मेहता की पूज्यनीय भाभी, "दूरित गौरी" जिनके व्यंग्य बाण नरसी मेहता के लिये रामबाण साबित हुए और उनकी सम्पूर्ण जीवन धारा का प्रवाही परिवर्तित हो गया। तानों के कुछ नमूने यहाँ प्रस्तुत हैं "भजन में साधु, भोजन में भीम"। रामायण के पात्र - कैकेयी तथा मंथरा को भी हम विस्मृत नहीं कर सकते हैं। जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवनधारा ही परिवर्तित कर दी - कहाँ राज्याभिषेक और कहाँ चौदह वर्ष का वनवास। हाय रे, नियति! किसे दोष दें। सीता का त्याग दुर्लभ है।
महाभारत काल में नारी पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक गतिविधियों को संचालित करने वाली केन्द्रीय शक्ति रही है। आधुनिक काल में नारी सशक्त हुई है। यथा भारतीय नारियां शक्ति पुंज के रूप में प्रसिद्ध हैं। साहित्य के क्षेत्र में: सरोजनी नायडू (भारत कोकिला), महादेवी वर्मा, सरोजिनी प्रीतम, सुभद्रा कुमारी चौहान, तनुप्रिया, मीराबाई आदि। प्रशासनिक क्षेत्र में: सरोजनी नायडू, राजकुमारी अमृतकौर, नजमा हेपतुल्ला, निर्मला सीतारमण, सुमित्रा महाजन आदि। संगीतकला के क्षेत्र में: तानारीरी, सुब्बालक्ष्मी, लता मंगेशकर, ऊषा एवं आशा मंगेशकर, सुनिधी चौहान, श्रेया घोषाल। पर्वतारोहण में: बेछिन्दी पाल भी अपना एक विशेष स्थान रखती हैं। राजनीति के क्षेत्र में: परम सम्मानिया द्रौपदी मुर्मू, सुचेता कृपलानी, आनंदीबेन पटेल, सुषमा स्वराज, किरण बेदी की देश सेवा को कभी नहीं भुलाया जा सकता।
यह बात निर्विवाद सत्य है कि विश्व में सभी क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप से भारतीय नारी कहीं-कहीं पिछड़ी दिखाई देती है। किन्तु यदि गंभीरता पूर्वक इस तथ्य को देखा जाये तो उसके कई कारण हैं। देश सदियों विदेशी आक्रमणों से दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा है। उसे उसकी संस्कृति और सभ्यता को प्रताड़ित कर विदेशी संस्कृति में जकड़ने का प्रयास किया गया।
इस तथ्य को आज अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में समझते हुए नारी उत्थान के लिये केन्द्र सरकार ही नहीं अपितु सभी राज्य सरकारें नारी कल्याण व उसके सर्वांगीण विकास के कार्यों में लगी हुई हैं। आज की भारतीय नारी घर की चौखट में कैद नहीं है अपितु स्वतंत्रता के आकाश में सभी क्षेत्रों में खुली सांस लेकर अपना ही नहीं राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विकास कर रही है और उसका भविष्य अत्यन्त उज्जवल है।

Post a Comment